₹3 लाख या न्याय? Acid Attack Compensation का सच | Law vs Reality (India 2026)

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क्या ₹3 लाख किसी की जिंदगी की कीमत हो सकती है? जानिए Acid Attack Compensation का पूरा सच।

प्रस्तावना

Acid Attack के मामलों में कानून ₹3 लाख की बात करता है… लेकिन आज के समय में क्या यह किसी की जिंदगी, पहचान और दर्द की कीमत हो सकती है?

Acid Attack किसी भी व्यक्ति पर किया गया अमानवीय तथा भीभत्स हमला होता है | यह किसी इंसान के शरीर मात्र पर हमला नहीं होता है, बल्कि उसकी पहचान, आत्मसम्मान और उसके पूरे भविष्य पर हमला होता है |

यह हमला पीड़ित की जिंदगी हमेशा के लिए बदल देता है | भारत में कानूनी तौर पर पीड़ित को कम से कम 3 लाख रुपये मुआवजे के रूप में सरकार की मुआवजा नीति के तहत दिए जाने का प्रावधान है |

पहली दृष्टि में यह न्याय लगता है लेकिन जमीनी हकीकत इससे इतर है | क्या 3 लाख रुपये किसी की जिंदगी में उसकी पहचान,आत्मसम्मान और उसके पूरे भविष्य पर हमले के मुआवजे के लिए काफी हैं |

यही से शुरुआत होती है Acid Attack मुआवजे की असली सच्चाई के बारे में जानने की |

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Acid Attack : भारत में कानूनी ढांचा

भारत में Acid Attack के अपराध को गंभीरता से लिया गया है इसी लिये इसके सम्बन्ध में पुराने क़ानून की धारा 326 A तथा 326B में अलग से कानूनी प्रावधान किया गया था | इस प्रावधान को अब नए क़ानून BNS के तहत धारा 124 में समाहित किया गया है |

धारा 124(1) के अनुसार जो कोई किसी व्यक्ति के शरीर के भाग या किन्हीं भागों को उस व्यक्ति पर Acid Attack कर या उसे Acid देकर या किन्हीं अन्य साधनो का प्रयोग करके, ऐसा कारित करने के आशय से या ज्ञान से कि संभावना है कि उनमे ऐसी छति या उपहति कारित हो, स्थाई या आंशिक नुक्सान कारित करेगा या अंग विकार करेगा या जलाएगा या विकलांग बनाएगा या विकृत करेगा या निशक्त बनाएगा या घोर उपहति कारित करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा :

परन्तु ऐसा जुर्माना पीड़ित के उपचार के चिकित्स्कीय ख़र्चों को पूरा करने के लिए न्यायोचित और युक्तियुक्त होगा :

परन्तु यह और कि इस उपधारा के अधीन अधिरोपित कोई जुर्माना पीड़ित को संदत्त किया जाएगा |

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(2 ) जो कोई, किसी व्यक्ति को स्थाई या आंशिक नुक्सान कारित करेगा या अंग विकार करेगा या जलाएगा या विकलांग बनाएगा या विकृत करेगा या निशक्त बनाएगा या घोर उपहति कारित करने के आशय से उस व्यक्ति पर Acid Attack करेगा या Acid Attack का प्रयत्न करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि 5 बर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु जो 7 वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायेगा और जुर्माने के लिए भी दाई होगा |

इसके अलावा, Supreme Court ने कई महत्वपूर्ण फैसलों में सरकारों को निर्देश दिया है कि:

1. Victims को न्यूनतम ₹3 लाख मुआवजा मिले |
2 . मुफ्त इलाज उपलब्ध कराया जाए |
3. Acid की बिक्री को नियंत्रित किया जाए |

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Acid Attack:मानव अधिकार सन्दर्भ

Acid attack एक सामान्य अपराध नहीं है बल्कि यह व्यक्ति की पहचान, गमानवीय गरिमा, स्वंत्रता और जीवन के अधिकार पर हमला करने वाला गंभीर अपराध है |

यह पीड़ित के मानव अधिकारों पर सीधा हमला होता है | इसलिए यह मुदा सिर्फ शारीरिक चोट पहुंचाने तक सीमित नहीं है बल्कि मानव अधिकारों के उल्लंघन का मामला है |

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Acid Attack पर पर न्यायिक दृष्टिकोण

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने Acid Attack के कई मामलों में निर्णय दिए हैं | महत्वपूर्ण निर्णय यहाँ दिए जा रहे हैं |

1. Laxmi v. Union of India (2014) 4 SCC 427

यह पहला Acid Attack का मामला था जिसमे उसने Acid Attack को रोकने के लिए सख़्त दिशा-निर्देश जारी किये गए| इसमें कहा गया कि Acid Attack के पीड़ित व्यक्ति को कम से कम 3 लाख रुपये सरकार द्वारा दिए जाने चाहिए|

यह भी निर्देश दिया कि उनकी चिकित्सा सुविधा भी नि:शुल्क उपलब्ध कराई जानी चाहिए | इसके अलावा कोर्ट ने Acid की बिक्री को रेगुलेट किये जाने के भी आदेश किये गए | सुप्रीम कोर्ट द्वारा Acid Attack के सम्बन्ध में यह एक ऐतिहासिक निर्णय था |

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2. Parivartan Kendra v. Union of India, (2016) 3 SCC 571

सुप्रीम कोर्ट की इस विधिव्यवस्था में इस बात पर बल दिया गया था कि Acid Attack पीड़ित को Compensation मिलने में देरी नहीं होनी चाहिए |

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि Acid Attack पीड़ित के पुनर्वास की जिम्मेदारी राज्य की है | अदालत ने यह भी कहा कि Acid Attack पीड़ित को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार है,जो केवल आर्थिक सहायता से पूरा नहीं हो सकता है |

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3. State of Himachal Pradesh v. Vijay Kumar, (2018) 17 SCC 780

इस विधि व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट ने acid attack को एक घृणित अपराध माना और इस प्रकार के अपराधों में सख्त सजा देने की आवश्यकता पर जोर दिया। यह फैसला समाज में कठोर सजा स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जाता है।

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4. Ashok Kumar v. State of Haryana, (2015) 2 SCC 702

इस विधि व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट ने स्थापित किया है कि अभियुक्त की सजा निर्धारित करते समय पीड़ित की पीड़ा, उसे लगने वाला धक्का, और उसके ऊपर पड़ने वाला दीर्घकालिक प्रभाव को ध्यान में रखा जाना आवश्यक है |

यह ऐतिहासिक फैसला न्याय को केवल दंड तक सीमित नहीं करता है बल्कि पीड़ित केंद्रित अवधारणा को मजबूत करता है |

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Acid Attack की वास्तविकता : Law vs Reality

कानून कुछ कहता है, लेकिन जमीनी हकीकत अक्सर कुछ और होती है | Acid Attack के मामलों में अक्सर देखा जाता कि पीड़ित को मुआवजा पाने में कई वर्ष तक लग जाते हैं, जिससे न्याय का मकसद ही पूरा नहीं होता है |

इस लेख के लेखक के समक्ष उत्तर प्रदेश के आगरा जिले से एक Acid Attack का मामला सामने आया है, जिसमे मुकदद्मे को चलते हुए 15 वर्ष से अधिक का समय गुजर चुका है |

इस Acid Attack की घटना में पीड़िता की एक आँख की रोशनी हमेशा के लिए चली गई है | इतना समय गुजरने के बाद भी उसे किसी भी तरह की आर्थिक सहायता नहीं मिली है | इससे Acid Attack मुआवजे के नीतिगत क्रियान्वयन का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है |

इससे उनका पुनर्वास भी प्रभावित होता है | यदि पीड़ित का शरीर Acid Attack के प्रभाव से ज्यादा प्रभावित हो जाता है उस स्थति में चिकित्सा बेहद खर्चीली होती है तथा कई बार कई -कई सर्जरी भी करानी पड़तीं हैं | ऐसी स्थति में समय से उचित मुआवजा न मिलने से पीड़ितों की कठिनाइयां अत्यधिक बाद जाती हैं |

इसके अलावा Acid Attack के व्यक्ति के शरीर पर प्रभाव के बाद सामाजिक कलंक भी एक गंभीर समस्या के रूप में पीड़ित को झेलने को विवश होना पड़ता है |

जिसके कारण पीड़ितों को समाज और रोजगार में तिरस्कार, रोजगार की कमी और मानसिक समस्यायों का भी सामना करना पड़ता है | ऐसे में ₹3 लाख का मुआवज़ा केवल एक औपचारिकता भर बनकर रह जाता है, जो वास्तविक न्याय की अवधारणा से कोसों दूर है |

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Acid Attack पीड़ित मुआवज़ा कैसे प्राप्त करें ?


Acid Attack हर पीड़ित को तुरंत इलाज और आर्थिक सहायता की आवश्यकता पड़ती है, जिसके लिए भारत में एक प्रक्रिया निर्धारित की गई है |

इस प्रक्रिया के अनुपालन में सबसे पहले पीड़ित की तरफ से प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराना आवश्यक होता है | नए क़ानून भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत धारा 124 (1) &(2) में Acid Attack के अपराध और उसके प्रयास को समाहित किया गया है | यही FIR मुआवजे को प्राप्त करने का आधार है |

इसके बाद पीड़ित को सरकारी तथा निजी अस्पताल में मुफ्त इलाज का अधिकार है | कोई भी अस्पताल इलाज से मना नहीं कर सकता है |

चिकित्सा प्रमाण पत्र मुआवजी की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक होते हैं | इसके बाद पीड़ित की तरफ से राज्य की मुआवजा योजना के तहत जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) या राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (SLSA) में आवेदन करना होता है |

इसके लिए आवेदन न्यायालय के समक्ष भी प्रस्तुत किया जा सकता है लेकिन मुआवजा निर्धारण का अधिकार जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) या राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (SLSA) को ही है |

पीड़ित को आवेदन के साथ FIR की कॉपी, मेडिकल रिपोर्ट, पहचान पत्र, बैंक विवरण और फोटो जैसे दस्तावेज़ लगाने पड़ते हैं | इसके बाद DLSA Acid Attack के मामले की जांच कर पीड़ित को आई चोट और आवश्यकताओं का आकलन करता है, जिसके आधार पर ही मुआवज़ा तय होता है |

सामान्यतया ₹1 लाख की अंतरिम सहायता तुरंत दी जाती है और शेष राशि बाद में, जबकि कुल न्यूनतम ₹3 लाख सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार देना आवश्यक होता है |

लेकिन इसे आवश्यकता अनुसार 8 लाख तक किया जा सकता है | अंतरिम राहत तुरंत दिए जाने के प्रावधान हैं | शेष राशि बाद में दिए जाने का प्रावधान है |

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निष्कर्ष

भारत में Acid Attack के मामलों में न्यायालय द्वारा निर्देशित क़ानून के अनुपालन में सरकार न्यूनतम ₹3 लाख मुआवज़े की व्यवस्था जरूर करती है, लेकिन क्या यह वास्तविक न्याय है ? वास्तव में वास्तविक न्याय व्यापक है |

जब एक Acid Attack पीड़ित को समय से उचित मुआवजा नहीं मिल पाता है तथा उसके सामने ऐसी स्थतियाँ होती हैं कि उन्हें उन्हें कई सर्जरी के दौर से गुजरना है, इसके साथ -साथ उनके सामने मानसिक आघात और सामाजिक पुनर्वास जैसी चुनौतियों से जूझना होता है तब यह मुआवजा राशि निश्चित रूप से पर्याप्त नहीं होती है |

ऐसी स्थति में “Law vs Reality” का अंतर साफ़ तौर पर दिखाई देता है कि मुआवजे का प्रावधान कर देना ही पर्याप्त नहीं होता है, बल्कि मुआवजे का समय से भुगतान, दीर्घकालीन चिकित्सा सुविधा, प्रभावी सामाजिक पुनर्वास के साथ-साथ गरिमा के साथ जीवन जीने का अवसर भी उतने ही आवश्यक है |

इसमें सुधार के लिए इसी वास्तविकता को समझना आवश्यक है तभी Acid Attack पीड़ितों को वास्तविक तथा सही मायने में न्याय मिल सकेगा |

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ ):

प्रश्न1. Acid Attack मुआवजा क्या होता है?

उत्तर : Acid attack के पीड़ितों को सरकार द्वारा दी जाने वाली आर्थिक सहायता को Acid Attack मुआवज़ा कहा जाता है, जिसका उद्देश्य पीड़ित का इलाज तथा उसका सामाजिक पुनर्वास में सहायता करना होता है |

प्रश्न 2. भारत में Acid Attack पीड़ित को कितना मुआवजा मिलता है ?

उत्तर : इस सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार न्यूनतम ₹3 लाख मुआवज़ा दिए जाने का प्रावधान किया गया है | लेकिन इस सम्बन्ध में Acid Attack के कारण हुई छति के अनुसार यह 8 लाख तक बढ़ाया जा सकता है | इसमें एक हिस्सा तुरंत तथा बकाया बाद में दिया जाता है |

प्रश्न 3. क्या ₹3 लाख मुआवजा पर्याप्त है?

उत्तर : नहीं, अधिकांश मामलों में ₹3 लाख रुपये की धनराशि पर्याप्त नहीं होती है, क्योंकि इलाज, सर्जरी और पुनर्वास का खर्च दसियों लाख रुपये से अधिक हो सकता है |

प्रश्न 4. Acid Attack मुआवजा देने की जिम्मेदारी किसकी होती है?

उत्तर : यह जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होती है, जो पीड़ित मुआवजा योजना के तहत यह राशि प्रदान करतीं हैं।

प्रश्न 5. क्या Acid Attack पीड़ित को नि: शुल्क इलाज की व्यवस्था है ?

उत्तर : हाँ, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार सरकारी और कई निजी अस्पतालों में पीड़ित के इलाज की निःशुल्क व्यवस्था का प्रावधान है |

प्रश्न 6. Acid Attack मुआवजे को मिलने में देरी क्यों होती है ?

उत्तर : लचर प्रशासनिक प्रक्रिया, दस्तावेज़ीकरण की कमी और सरकारी तंत्र की धीमी कार्यप्रणाली के अलावा कई बार पीड़ितों को Acid Attack मुआवजे के बारे में जानकारी केअभाव के कारण भी अक्सर देरी होती है।

प्रश्न 7 . Acid Attack मुआवजे में सबसे बड़ी समस्या क्या है?

उत्तर : Acid Attack मुआवजे में सबसे बड़ी समस्या पीड़ित को कम धन-राशि मिलना, धन-राशि देरी से मिलना और नीतियों का कमजोर क्रियान्वयन है, जिससे पीड़ित को वास्तविक न्याय नहीं मिल पाता है |

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अस्वीकरण

यह लेख केवल शैक्षणिक और विधिक जन-जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है | यह किसी विशेष व्यक्ति, संस्था या मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं है | अधिक जानकारी के लिये योग्य अधिवक्ता से परामर्श आवश्यक है |

Note: Image credit: AI-generated illustration (created with ChatGPT)

 लेखक

Dr Raj Kumar
Founder- Human Rights Guru / Law Vs Reality




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