
प्रस्तावना :“Cockroach” शब्द ने क्यों खड़ा किया बड़ा सवाल?
15 मई 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की एक मौखिक टिप्पणी ने देशभर के युवाओं को आक्रोश से भर दिया | मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार उन्होंने टिप्पणी की थी कि कुछ लोग नौकरी न मिलने पर सोशल मीडिया, पत्रकारिता और RTI के माध्यम से व्यवस्था पर हमला करते हैं और वे “Cockroach” तथा “parasites” की तरह हैं।
इस टिप्पणी को लेकर सोशल मीडिया तथा समाज में एक तीखी बहस शुरू हो गई है, जो मुख्य न्यायाधीश द्वारा सफाई दिए जाने के बाद भी थमने का नाम नहीं ले रही है |
देशभर में सोशल मीडिया पर कड़ी आलोचना के बाद मुख्य न्यायाधीश ने अपनी टिप्पणी के बारे में स्पष्ट किया कि उनका आशय भारतीय युवाओं से नहीं, बल्कि फर्जी डिग्रियों के आधार पर पेशों में प्रवेश करने वाले लोगों से था।
फिर भी यह प्रश्न आज भी प्रासंगिक है कि क्या बेरोजगार, संघर्षरत, मेहनत और ईमानदारी से काम करने वाले युवाओं को “Cockroach” समझा जाएगा ?
हर युवा के लिए यह सुनने में भी अत्यधिक दर्दनाक और पीड़ादायक है, जो समाज में भविष्य में भी उनके लिए एक गाली के रूप में उपयोग किये जाने वाले शब्द बन जायेगे | अब इन शब्दों का समाज में युवा बेरोजगारों के प्रति दुराग्रह के रूप में उपयोग किये जाने का भी ख़तरा बढ़ गया है |
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क्या मैं भी “Cockroach” हूँ?
मैं, डॉ. राज कुमार, आगरा दीवानी न्यायालय में अधिवक्ता हूँ। मैंने Babasaheb Bhimrao Ambedkar (Central) University,Lucknow के मानव अधिकार विभाग से पीएच.डी. की है।
मैंने LL.M. (Human Rights and Duties), LL.B., मानवाधिकार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त किया, UGC-NET उत्तीर्ण किया और मानवाधिकार विषय में भारत सरकार की प्रतिष्ठित पहली Rajiv Gandhi National Fellowship प्राप्त की। मेरे अनेक शोधपत्र राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं तथा जर्नल्स में प्रकाशित हुए हैं।
इसके बावजूद मुझे कोई स्थायी सरकारी या शैक्षणिक नौकरी नहीं मिली। क्यों कि सरकार ने मानव अधिकार विषय को UGC द्वारा मान्यता प्राप्त विषयों में तो मान्यता प्रदान कर दी, लेकिन मानव अधिकार विषय में किसी भी प्रकार की नौकरी निकालना भूल गई |
सबसे गंभीर बात तो यह है कि Babasaheb Bhimrao Ambedkar (Central )University, Lucknow के मानव अधिकार विभाग में LL.M मानव अधिकार के छात्रों को पढ़ाने के लिए Assistant Professor की Vacancy प्रकाशित की जाती है और उसमे Qualification मानव अधिकार विषय के स्थान पर लॉ मांगी जाती है |
मानव अधिकार विषय में UGC NET की परिक्षा Conduct कराता है और मानव अधिकार विषय में UGC NET उत्तीर्ण छात्र उपलब्ध हैं, लेकिन निहित स्वार्थ तथा दुराग्रह हावी होने के चलते यह शैक्षणिक भ्रष्टाचार अनवरत चलता रहता है |
यही नहीं, मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 30 के अधीन जिला मानव अधिकार न्यायालयों के गठन का प्रावधान किया गया है |
लेकिन सरकार ने उन न्यायालयों के सुचारू संचालन के लिए Original Juridiction का प्रावधान ही नहीं किया है | जबकि मानव अधिकार अधिनियम को बने हुए 30 वर्ष से अधिक का समय गुजर चुका है |
ऐसा नहीं है कि जिला मानव अधिकार न्यायालयों का गठन नहीं किया गया है, बल्कि उनमे तकनीकी और जागरूकता के अभाव के कारण मुकदद्मे ही नहीं संस्थित होते हैं | राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, दिल्ली जैसी संस्था भी इस विषय पर ध्यान नहीं देती है, यह आश्चर्यजनक बात है |
मानव अधिकार विषय का छात्र कहाँ जाएगा ? यदि कोई मांग करता है, तो कहा जाएगा कि सिस्टम पर हमला करता है |
तो क्या केवल इसलिए कि मैं संघर्षरत हूँ, कानूनी तथा मानव अधिकार विषयों पर ब्लॉग लिखता हूँ और न्याय के लिए कार्य करता हूँ—मैं भी “Cockroach” हूँ?
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संघर्षरत भारतीय नागरिक : “Cockroach” नहीं, संविधान के प्रहरी
मैं आगरा दीवानी न्यायालय में किशोर न्याय, पोक्सो अधिनियम, महिला उत्पीड़न, मानव अधिकार उलंघन तथा खाद्य सुरक्षा जैसे आपराधिक मामलों की पैरवी करता हूँ | साथ ही, मैं अपने ब्लॉग Human Rights Guru और Law Vs Reality के माध्यम से समाज में कानूनी और मानवाधिकार जागरूकता फैलाता हूँ।
यदि कोई युवा अधिवक्ता अदालत में न्याय के लिए लड़ते -लड़ते बृद्ध हो जाए, समाज को जागरूक करे और लेखन के माध्यम से संवैधानिक और मानव अधिकार मूल्यों का प्रसार करे, तो उसे “Cockroach” कहना कहाँ तक उचित है, बल्कि इस प्रकार की टिप्पणी उसकी मानवीय गरिमा जैसे मानव अधिकार पर गंभीर आघात भी है।
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“Cockroach” Remark और मानवाधिकारों का दृष्टिकोण
अंतराष्ट्रीय मानव अधिकार सहित भारतीय संविधान प्रत्येक व्यक्ति को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देते है। माननीय सुप्रीम कोर्ट की ही विधि व्यवस्था Justice K.S. Puttaswamy (Retd.) v. Union of India में न्यायालय ने स्थापित किया कि मानवीय गरिमा जीवन के अधिकार का अभिन्न तत्व है।
जब भारतीय संघर्षरत युवाओं को “Cockroach” या “Parasite” जैसे शब्दों से नवाजा जाता है, तो यह मानवाधिकारों की मूल भावना के अत्यधिक विपरीत प्रतीत होता है। एक सभ्य समाज में यह किसी भी रूप में स्वीकार्य करने योग्य नहीं है |
यद्धपि अत्यधिक जनाक्रोश के बाद आई मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी ने मामले का पटाक्षेप कर दिया है | लेकिन फिर भी एक बार मुख्य न्यायाधीश के मुख से निकले शब्द बेरोजगारों को पता नहीं भविष्य में कब तक उनकी मानवीय गरिमा से वंचित करते रहेंगे |
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बेरोज़गारी, ब्लॉगिंग और सामाजिक योगदान
अपनी पसंद का रोजगार अपनाने की आजादी भारतीय युवाओं को संवैधानिक रूप में प्राप्त हैं, फिर भी उसके ऊपर “Cockroach” या “parasites” जैसी अमानवीय टिप्पणी उनके मनोबल और संघर्ष को तोड़ने के लिए काफी हैं |
आज भारत में लाखों -लाख युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की देरी , प्रतियोगी परीक्षाओं के होने से पहले ही पेपरों के आउट होने, आर्थिक असुरक्षा तथा मानसिक दबाब के बीच अपना भविष्य बनाने के लिए प्रयासरत है |
ऐसे में यदि वे ब्लॉग लिखते हैं, RTI लगाते हैं, पत्रकारिता करते हैं या सोशल मीडिया पर समाज की आवाज बुलंद करते हैं या कानूनी जागरूकता फैलाते हैं, तो उन्हें “Cockroach” या “parasites” नहीं बल्कि लोकतंत्र की सशक्त आवाज़ माना जाना चाहिए।
इनके द्वारा किये जाने वाले कार्य कोई अवैध, अनैतिक या गैर कानूनी नहीं हैं | लेकिन यदि कोई क़ानून के परे जाकर कोई कार्य करता है तो उसके लिए ही तो क़ानून है |
आप सभी सुधीय पाठकों से मेरा अंतिम प्रश्न है कि यदि मैं मानवाधिकारों पर शोध करता हूँ, आपराधिक मामलों को अदालत में लड़ता हूँ, ब्लॉग्गिंग के माध्यम से समाज को कानून के प्रति जागरूक करता हूँ, और सम्मानपूर्वक जीवन जीने का प्रयास करता हूँ, तो क्या मैं भी “Cockroach” हूँ?
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निष्कर्ष: “Cockroach” नहीं, गरिमा और संघर्ष की पहचान
“Cockroach Remark 2026” ने हमें यह सोचने पर मजबूर किया है कि क्या भारत में संघर्षरत युवाओं को उनके योगदान से पहचानेंगे या उनकी बेरोज़गारी या बेवसी से?
मानवीय गरिमा के विरुद्ध किसी भी रूप में उपयोग किये जाने वाले शब्द हमेशा समाज में दुराग्रह पैदा करते हैं | आने वाले समय में बेरोजगार युवाओं, RTI कार्यकर्ताओं तथा सोशल मीडिया के लिए कार्य करने वाले लोगों के प्रति इन शब्दों का उपयोग तेजी से बढ़ने की सम्भावनाएँ हैं |
भारत के प्रथम पीढ़ी के अधिवक्ता, शोधकर्ता, ब्लॉगर और RTI कार्यकर्ता व्यवस्था पर बोझ नहीं हैं। वे संविधान, मानवाधिकार और भारतीय लोकतंत्र के वास्तविक रखवाले हैं।
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अस्वीकरण (Disclaimer)
यह लेख केवल जनहित और मानव अधिकारों के विमर्श के उद्देश्य से लिखा गया है। लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं और इनका उद्देश्य भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय, माननीय मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant या न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुँचाना नहीं है।
लेख में उल्लिखित “Cockroach” Remark का संदर्भ विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सूचनाओं पर आधारित हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि माननीय मुख्य न्यायाधीश ने बाद में स्पष्ट किया कि उनका आशय भारतीय युवाओं से नहीं, बल्कि फर्जी डिग्रियों के आधार पर पेशों में प्रवेश करने वाले व्यक्तियों से था।
यह लेख अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मानवीय गरिमा, अनुच्छेद 21 तथा मानवाधिकारों के संवैधानिक दृष्टिकोण का विश्लेषण प्रस्तुत करता है | लेख का उद्देश्य स्वस्थ लोकतांत्रिक विचार-विमर्श को बढ़ावा देना है,न कि किसी संस्था या व्यक्ति की अवमानना करना है | यदि किसी पाठक को लेख के किसी भाग से असहमति है तो उसे वैचारिक और शेक्षणिक विमर्श के रूप में देखा जाना चाहिए |
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Note: Image credit: AI-generated illustration (created with ChatGPT)
लेखक
Dr Raj Kumar
Founder- Human Rights Guru / Law Vs Reality