
भूमिका : “Consent vs Misuse” -आज का सबसे बडा कानूनी मुद्दा
भारत मे नये आपराधिक कानून BNS 2023 के आने के बाद दो लोगो के संबंधों के बारे में सबसे ज्यादा चर्चा जिस मुद्दे पर हो रही है, वह है -“Consent vs Misuse” |
भारत में Live-in-Relationship की अवधारणा आने के बाद अनेक मामलों में दो लोगों के बीच आपसी सम्बन्ध सहमति से शुरू होते हैं, लेकिन जब पारस्परिक सम्बन्ध टूटते हैं, तो सहमति वाले पारस्परिक सम्बन्ध कई अलग -अलग कारणों से बलात्कार के आरोप तक में बदल जाते हैं |
जब ऐसे मामले अदालत के समक्ष पहुंचते हैं, तो अदालत के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है कि “Consent vs Misuse” की स्थिति में क्या दोनों लोगों के बीच पारस्परिक सम्बन्ध सहमति आधारित थे ? या फिर पारस्परिक विवाद के बाद लगाया गया बलात्कार का आरोप कानून का दुरुपयोग है ?
नए कानून BNS 2023 के लागू होने के बाद भी “Consent vs Misuse” का पुराना सिद्धांत आज भी लागू है कि सहमति तभी वैध है जबकि वह स्वतंत्र ,स्वैक्षिक और बिना किसी धोखे और दबाब के ली गई है |
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“Consent vs Misuse” के संदर्भ में Supreme Court के 5 बड़े फैसले
“Consent vs Misuse” के अंतर को स्पष्ट करते हुए माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कई निर्णय दिए हैं, लेकिन यहाँ सिर्फ 5 सुसंगत निर्णयों का संदर्भ प्रस्तुत किया जा रहा है |
1. Prithivirajan vs The State Represented by the Inspector of Police & Anr. (2025): “Consent vs Misuse”
“Consent vs Misuse” के संदर्भ में Supreme Court of India का स्पष्ट और महत्वपूर्ण दृष्टिकोण है कि केवल शादी के वादे के आधार पर शारीरिक संबंध स्थापित होने मात्र से ही बलात्कार नहीं माना जाएगा।
बलात्कार का अपराध सिद्ध होने के लिए निम्नलिखित शर्तें पूरी होनी चाहिए:
पहली, आरोपी ने पीड़िता से शादी का वादा किया हो, केवल यौन संबंध के लिए सहमति प्राप्त करने के उद्देश्य से, न कि शुरू से ही उक्त वादे को पूरा करने के इरादे से;
दूसरी, पीड़िता ने यौन संबंध के लिए अपनी सहमति दी हो, शादी के ऐसे झूठे वादे से सीधे प्रभावित होकर।
सुप्रीम कोर्ट की विधि व्यवस्था Prithivirajan vs The State Represent by the Inspector of Police & Anr. Criminal Appeal No (S) of 2025 में कोर्ट ने कहा कि मामला अपीलकर्ता और पीड़िता के बीच आपसी सहमति से बने संबंध का पाया गया। रिकॉर्ड से यह नहीं लगता कि अपीलकर्ता ने शुरुआत से ही शादी का झूठा वादा किया था।
एफआईआर से स्पष्ट होता है कि कुछ परिस्थितियों के कारण वह विवाह का वादा पूरा नहीं कर सका, जिसके बाद संबंध समाप्त हो गया और शिकायत दर्ज कराई गई।
ऐसी स्थिति में अपीलकर्ता को मुकदमे का सामना करने के लिए मजबूर करना न्यायालय की प्रक्रिया का Misuse माना गया, जिसकी अनुमति नहीं दी जा सकती। यह “Consent vs Misuse” से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला है |
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2. Sonu @ Subhash Kumar v. State of Uttar Pradesh & Anr. (2021):“Consent vs Misuse”
विधि व्यवस्था Sonu @ Subhash Kumar v. State of Uttar Pradesh & Anr. (2021) में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि एफआईआर की सामग्री और सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दिए गए बयान से इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाता कि आरोपों के आधार पर, तीन महत्वपूर्ण बातें सामने आती हैं:
(i) अपीलकर्ता और दूसरे प्रतिवादी के बीच संबंध सहमति से था;
(ii) दोनों पक्ष लगभग डेढ़ वर्ष से संबंध में थे; और
(iii) बाद में, अपीलकर्ता ने दूसरे प्रतिवादी से विवाह करने की अनिच्छा व्यक्त की, जिसके कारण एफआईआर दर्ज की गई।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने Pramod Suryabhan Pawar Vs. State of Maharashtra पर भरोसा जताते हुए अपील को स्वीकार किया गया तथा अवर न्यायालय का संज्ञान आदेश तथा हाई कोर्ट का विवादित निर्णय तथा आदेश भी निरस्त किया गया |
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3. Pramod Suryabhan Pawar Vs. State of Maharashtra, (2019): “Consent vs Misuse”
माननीय सुप्रीम कोर्ट की विधि व्यवस्था Pramod Suryabhan Pawar Vs. State of Maharashtra,(2019) 9 SCC 608 में “Consent vs Misuse” से सम्बंधित कानून के सिद्धांतों को निम्नलिखित टिप्पणियों में प्रतिपादित किया गया था:
“जहां विवाह का वादा झूठा है और वादा करने वाले का इरादा वादा निभाते समय उसे पूरा करना नहीं था, बल्कि महिला को धोखा देकर उसे यौन संबंध बनाने के लिए राजी करना था, वहां “तथ्य की गलतफहमी” है जो महिला की “सहमति” को अमान्य कर देती है।
दूसरी ओर, किसी वादे का उल्लंघन झूठा वादा नहीं कहा जा सकता। झूठे वादे को साबित करने के लिए, वादा करने वाले का वादा निभाते समय उसका कोई इरादा नहीं होना चाहिए था…”
इसके अलावा, न्यायालय ने टिप्पणी की है:
उपरोक्त मामलों से उभरने वाली कानूनी स्थिति का सारांश यह है कि धारा 375 के संबंध में किसी महिला की “सहमति” में प्रस्तावित कृत्य के प्रति सक्रिय और तर्कसंगत विचार-विमर्श शामिल होना चाहिए।
यह स्थापित करने के लिए कि क्या “सहमति” विवाह के वादे से उत्पन्न “तथ्य की गलतफहमी” से दूषित थी, दो बातें सिद्ध होनी चाहिए।
प्रथम: विवाह का वादा झूठा होना चाहिए, दुर्भावना से दिया गया हो और उस समय इसका पालन करने का कोई इरादा न हो।
द्वितीय: झूठा वादा स्वयं तत्काल प्रासंगिक होना चाहिए, या महिला के यौन क्रिया में शामिल होने के निर्णय से सीधा संबंध रखता हो।”
इस विधि व्यवस्था में “Consent vs Misuse” के सिद्धांत को अत्यधिक बारीकी से स्पष्ट किया गया है | जिसे आम आदमी भी आसानी से समझ सकता है |
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4. Deepak Gulati vs State of Haryana, (2013):“Consent vs Misuse”
दीपक गुलाटी बनाम हरियाणा राज्य (2013) 7 एससीसी 675 के मामले में, इस न्यायालय ने अनुच्छेद 21 और 24 में निम्नलिखित अवलोकन और निर्णय दिया:
“21. सहमति स्पष्ट या निहित, दबावयुक्त या गुमराह करने वाली, स्वेच्छा से या छल से प्राप्त की जा सकती है। सहमति एक तर्कसंगत कार्य है, जिसमें विचार-विमर्श शामिल होता है, मन तराजू की तरह दोनों पक्षों के अच्छे और बुरे का आकलन करता है।
बलात्कार और सहमति से यौन संबंध में स्पष्ट अंतर है और इस तरह के मामले में, न्यायालय को बहुत सावधानीपूर्वक जांच करनी चाहिए कि क्या आरोपी वास्तव में पीड़िता से शादी करना चाहता था या उसके दुर्भावनापूर्ण इरादे थे, और उसने केवल अपनी वासना को संतुष्ट करने के लिए झूठा वादा किया था, क्योंकि बाद वाला धोखाधड़ी या धोखाधड़ी के दायरे में आता है।
केवल वादे का उल्लंघन और झूठे वादे को पूरा न करने में अंतर है।
इसलिए, न्यायालय को यह जांच करनी चाहिए कि क्या आरोपी द्वारा प्रारंभिक चरण में विवाह का झूठा वादा किया गया था; और क्या सहमति यौन संबंध की प्रकृति और परिणामों को पूरी तरह से समझने के बाद दी गई थी।
ऐसा मामला हो सकता है जहां पीड़िता आरोपी के प्रति अपने प्रेम और जुनून के कारण यौन संबंध बनाने के लिए सहमत हो जाती है, न कि केवल आरोपी द्वारा किए गए गलत बयान के कारण, या जहां आरोपी ऐसी परिस्थितियों के कारण, जिनका वह अनुमान नहीं लगा सकता था, या जो उसके नियंत्रण से बाहर थीं, उससे विवाह करने में असमर्थ था, जबकि उसका ऐसा करने का पूरा इरादा था।
ऐसे मामलों को अलग तरीके से निपटाया जाना चाहिए। किसी आरोपी को बलात्कार के लिए तभी दोषी ठहराया जा सकता है जब न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आरोपी का इरादा दुर्भावनापूर्ण था, और उसके गुप्त इरादे थे।
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K.P. Thimmappa Gowda Vs State of Karnataka, (2011):“Consent vs Misuse”
माननीय सुप्रीम कोर्ट की विधि व्यवस्था K.P. Thimmappa Gowda Vs State of Karnataka, (2011) 14 SCC 475 में मामले में तथ्य यह है कि रत्नाम्मा ने स्वयं अपने बयान में स्वीकार किया है कि उसने अपीलकर्ता के साथ कई बार यौन संबंध बनाए थे।
यह भी सर्वविदित तथ्य है कि अपीलकर्ता के विरुद्ध एफआईआर रत्नाम्मा के बच्चे के जन्म से कुछ ही दिन पहले दर्ज की गई थी, जिसका अर्थ है कि एफआईआर दर्ज करने में 8 महीने से अधिक की देरी हुई है।
निचली अदालत का फैसला, जिसे उच्च न्यायालय ने भी नहीं बदला है, यह है कि संबंधित समय पर रत्नाम्मा की आयु लगभग 18 वर्ष थी।
इन तथ्यों के आधार पर यह मानना उचित है कि रत्नाम्मा ने अपीलकर्ता के साथ अपनी सहमति से यौन संबंध बनाए थे और इसलिए आईपीसी की धारा 376 के तहत कोई अपराध नहीं बनता है, क्योंकि 16 वर्ष से अधिक आयु की महिला के साथ उसकी सहमति से यौन संबंध बनाना बलात्कार नहीं है।
उपरोक्त के अवलोकन से स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट के सभी 5 मामलों में “Consent vs Misuse” के सम्बन्ध में स्पष्ट व्याख्या की गई है | इस स्पष्ट व्याख्या को समझ कर समाज में अनेक लोग अनावश्यक कानूनी मुकदद्मों से बच सकते हैं |
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निष्कर्ष :
भारत में दो लोगो के बीच सहमति से स्थापित सम्बन्ध और उसके दुरुपयोग के बीच गंभीर जटिलताएं हैं | Supreme Court of India के महत्वपूर्ण निर्णयों से यह स्पष्ट होता है कि दो लोगों के बीच स्थापित हर सम्बन्ध को बलात्कार के दायरे में रखना न्यायसंगत नहीं है |
विशेष रूप से जब सम्बन्ध आपसी सहमति से बने हों और बाद में किसी भी कारण से पारस्परिक विवाद उत्पन्न हो गया हो |
Supreme Court of India ने बार -बार अपने निर्णयों में स्थापित किया है कि शादी के झूठे वादे, गलतफहमी या टूटे हुए रिश्तों को स्वतः अपराध नहीं माना जा सकता है, जबतक कि प्रारम्भ से ही धोखे या आपराधिक मंशा साबित न हो |
वहीं यदि सहमति धोखे, दबाब, झूठे वादे या किसी प्रवंचना के आधार पर प्राप्त की गई है, तो उसे वैध सहमति नहीं माना जाता है |
वर्तमान संदर्भ में “Consent vs Misuse” पर चल रही सामाजिक तथा कानूनी बहस यह दिखाती है कि न्यायालयों को हर मामले में परिस्थितयों और मंशा की गहराई से जांच-पड़ताल करनी चाहिए |
“Consent vs Misuse” का सही तथा संतुलित आँकलन ही यह सुनिश्चित करता है कि किसी वास्तविक पीड़ित के साथ अन्याय न हो तथा किसी निर्दोष को झूठा न फसाया जा सके |
इस लेख में उद्घृत 5 बड़े फैसलों से यह स्पष्ट है कि कानून का उद्देश्य केवल आरोपों के आधार पर सजा देना नहीं है, बल्कि बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों के बारे में गंभीर और गहन जाँच -पड़ताल करके न्याय और संतुलन सुनिश्चित करना है |
जिससे असली पीड़ितों को न्याय मिल सके तथा निर्दोष लोगो को गलत तरीके से फसने से बचाया जा सके | अर्थात उक्त 5 फैसले से “Consent vs Misuse” के बीच की महीन रेखा पूरी तरह से स्पष्ट दिखाई देती है |
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अस्वीकरण
यह लेख केवल शैक्षणिक और विधिक जन-जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है | यह किसी विशेष व्यक्ति, संस्था या मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं है | अधिक जानकारी के लिये योग्य अधिवक्ता से परामर्श आवश्यक है |
Note: Image credit: AI-generated illustration (created with ChatGPT)
लेखक
Dr Raj Kumar
Founder- Human Rights Guru / Law Vs Reality