अब हर शिकायत पर FIR नहीं होगी? UP के नए नियम ने मचाई बहस !

परिचय

उत्तर प्रदेश में FIR दर्ज करने की प्रक्रिया को लेकर बड़े बदलाव दृश्टिगोचर होते हैं | इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के एक हालिया आदेश (Anurodh Tiwari v. State of Uttar Pradesh) के बाद अब यह स्पष्ट किया जा रहा है कि हर मामले में सीधी FIR करना आवश्यक नहीं है, विशेष रूप से BNS की धारा 81 से लेकर 84 तक।

इन प्रावधानों के तहत पहले यह जांच करना आवश्यक है कि प्रकरण FIR के योग्य है या प्रकरण परिवाद के रूप में आगे बढ़ेगा | इसी सन्दर्भ UP FIR Rules 2026 को लागू किया गया है | जिसका उद्देश्य FIR और Complaint की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और कानूनी रूप से न्यायप्रिय बनाना है।

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क्यों जरूरी हुआ यह FIR सम्बंधित कदम?

माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद की लखनऊ खंडपीठ द्वारा एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया गया | यह आदेश अनुरुद्ध प्रसाद उर्फ़ अनुरोध तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य ,अंतर्गत धारा 528 BNSS संख्या 596 /596 से जुड़ा हुया है |

इस मामले में न्यायालय ने BNS की धारा 82 में FIR दर्ज किये जाने पर आपत्ति दर्ज करते हुए निम्नवत टिपणी की है :-

बीएनएस 2023 की धारा 2019 में यह प्रावधान है कि बीएनएस 2023 की धारा 81 से 84 के अंतर्गत दंडनीय अपराधों का संज्ञान तब तक नहीं लिया जाएगा जब तक कि अपराध से सहमत व्यक्ति द्वारा शिकायत न की गई हो।

हालांकि, वर्तमान मामला संख्या 0014/2025, बीएनएस 2023 की धारा 115(2), 352, 351(3), 85, 82(1) और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के अंतर्गत पुलिस स्टेशन महिला थाना, जिला श्रावस्ती में, बीएनएस की धारा 82 को एफआईआर दर्ज करते समय लागू किया गया है।

बीएनएस 2023 की धारा 220, 221 और 222 में यह प्रावधान है कि बीएनएस 2023 में कुछ अन्य अपराधों का भी उल्लेख है, जिनका संज्ञान न्यायालय पीड़ित व्यक्ति, राज्य या लोक सेवक द्वारा दायर परिवाद के अलावा किसी अन्य स्थिति में नहीं ले सकता। अतः, यह स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित है कि न्यायालय बीएनएस 2023 में उल्लिखित अपराधों का संज्ञान नहीं लेगा।

इस समस्या का निदान करने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश में FIR दर्ज कराये जाने के सम्बन्ध में नए नियम लागू किये गए हैं | FIR तथा परिवाद की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना है |

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उच्च न्यायालय इलाहाबाद की लखनऊ खंडपीठ के एक निर्णय के बाद आया FIR सम्बंधित निर्देश

इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ खंडपीठ की विधि व्यवस्था अनुरुद्ध प्रसाद उर्फ़ अनुरोध तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य में माननीय न्यायालय द्वारा की गई एक सख्त टिपणी के बाद उत्तर प्रदेश के DGP राजीव कृष्णा ने एक मत्वपूर्ण सर्कुलर जारी किया है |

इस सर्कुलर के माध्यम से उत्तर प्रदेश में 31 प्रकार के मामलों में सीधे FIR किये जाने को प्रतिबंधित कर दिया गया है | इन मामलों में सीधे FIR दर्ज किये जाने के बजाय पुलिस के द्वारा प्राथमिक जांच को आज्ञापक बना दिया गया है |

यद्धपि यह प्रावधान आपराधिक न्याय व्यवस्था में सुचिता और पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से लाया गया है और भारत में अभी सिर्फ उत्तर प्रदेश राज्य में लागू किया गया है |

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FIR सम्बंधित दिशानिर्देशो का उद्देश्य तथा क्षेत्र

इलाहाबाद हाई के लखनऊ खंडपीठ की विधि व्यवस्था अनुरुद्ध प्रसाद उर्फ़ अनुरोध तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य के अनुसरण में लागू किये गए दिशानिर्देश प्रक्रियात्मक अनिवार्यता पर अत्यधिक बल देते हैं |

हाई कोर्ट ने कहा कि BNS की धारा 81-84 के अंतर्गत झूठी शिकायतें/सबूत से संबंधित अपराध मजिस्ट्रेट के माध्यम से ही प्रारम्भ किये जाने चाहिये |

इन अपराधों में पुलिस द्वारा की गई FIR को कानूनी रूप से अवैध माना जाएगा | निर्देशों में कहा गया है कि पुलिस उन मामलों में FIR करने से बचें जिनमें कानूनन सीधे मजिस्ट्रेट को कंप्लेंट दर्ज करना अनिवार्य हो |

इन निर्देशों का उद्देश्य भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता ,2023 अथवा अन्य अधिनियमों में प्रावधान है कि उन अपराधों में FIR कराया जाना विधिक रूप से त्रुटिपूर्ण हैं ऐसे प्रकरणों में आरोप पत्र प्रस्तुत किये जाने पर माननीय न्यायालय द्वारा संज्ञान नहीं लिया जा सकता है |

इस प्रक्रियात्मक त्रुटि का लाभ अक्सर अपराधियों को ही मिलता है तथा पीड़ित के अधिकार विपरीत रूप से प्रभावित होते हैं |

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UP में FIR vs Complaint: हाईकोर्ट ने तय की सीमाएं

सुधीर गोयल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य सम्बंधित मु0अ0सं0-18 /2024 अंतर्गत धारा 420,406 IPC व 138 NI Act में माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद के आदेश दिनाक 6 /02 /25 के आदेश से पूर्व कुछ बहस के बाद न्यायालय ने पाया गया है कि पुलिस खान और खनिज अधिनियम, औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम और इसी तरह के अन्य कानूनों जैसे विशेष अधिनियमों के प्रावधानों के तहत एफआईआर दर्ज कर रही है, जबकि पुलिस रिपोर्ट पर संज्ञान लेना कानूनी रूप से वर्जित है।

परिणामस्वरूप, बुलंद शहर के एसएसपी को निर्देश दिया जाता है कि वे लखनऊ, उत्तर प्रदेश के महानिदेशक अभियोजन और अन्य संबंधित हितधारकों के परामर्श से एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करें, जिसमें उन मामलों का विवरण हो जहां इन अधिनियमों के तहत पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज करना निषिद्ध है।

जिसके परिणाम स्वरुप एक अधिनियमों की विस्तृत सूची तैयार की गई कि किन मामलों में FIR की जानी है तथा किन मामलों में कंप्लेंट/परिवाद की जानी है |

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विशेष अधिनियम जिनमें FIR नहीं बल्कि परिवाद दाखिल किये जाने की प्रक्रिया निर्धारित की है :

  1. घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005
  2. परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881
  3. खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 (MMDR Act)
  4. गर्भधारण पूर्व और प्रसवपूर्व निदान तकनीक (PCPNDT) अधिनियम, 1994
  5. उपभोक्ता- संरक्षण अधिनियम, 2019
  6. पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण अधिनियम, 1960
  7. बाल एवं किशोर श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986
  8. वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981
  9. वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972
  10. पर्यावरण (संरक्षण) अधिधिर्म, 1986
  11. आयात एवं निर्यात (नियंत्रण) अधिनियम, 1947
  12. खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954
  13. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013
  14. व्‍यापार चिह्न अधिनियम, 1999
  15. मानव अंग और ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम, 1994
  16. कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013
  17. जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974 
  18. केबल टेलीविजन नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम, 1995
  19. विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 
  20. कीटनाशक अधिनियम, 1968
  21. नोटरी अधिनियम, 1952
  22. बीमा अधिनियम, 1938
  23. पुरातन वस्तु तथा बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम, 1972 
  24. औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 
  25. खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006
  26. आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 
  27. राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019
  28. उत्तर प्रदेश गन्ना (आपूर्ति एवं खरीद विनियमन) अधिनियम, 1953
  29. उत्तर प्रदेश अग्नि निवारण एवं अग्नि सुरक्षा अधिनियम, 2005
  30. दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961
  31. वजन और माप मानक अधिनियम, 1976

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विशेष अधिनियम जिनमें FIR पंजीकृत किये जाने की प्रक्रिया निर्धारित है :

  1. स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ (NDPS) अधिनियम, 1985
  2. आर्म्स एक्ट (आयुध अधिनियम, 1959)
  3. आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955
  4. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989
  5. लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012
  6. किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015
  7. विस्‍फोटक अधिनियम, 1884
  8. विस्फोटक पदार्थ अधिनियम
  9. आपराधिक विधि संशोधन अधिनियम, 1932
  10. उत्तर प्रदेश गौहत्या निवारण अधिनियम, 1955
  11. मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019
  12. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988
  13. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000
  14. उत्तर प्रदेश गुण्डा नियंत्रण अधिनियम, 1970
  15. संयुक्त प्रांत आबकारी अधिनियम, 1910
  16. अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956
  17. चलचित्र अधिनियम 1952
  18. पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण अधिनियम, 1960
  19. प्रतिलिप्‍यधिकार अधिनियम, 1957
  20. सार्वजनिक जुआ अधिनियम, 1867
  21. लोक सम्पत्ति नुकसान निवारण अधिनियम – 1984
  22. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951
  23. विधिविरुद्ध क्रिया-कलाप (निवारण) अधिनियम, 1967
  24. उत्तर प्रदेश वृक्ष संरक्षण अधिनियम, 1976 
  25. उत्तर प्रदेश शैक्षणिक संस्थाओं में रैगिंग का प्रतिषेध अधिनियम, 2010
  26. उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) अधिनियम, 2024
  27. उत्तर प्रदेश विद्युत तार और ट्रांसफार्मर (चोरी की रोकथाम एवं दंड) अधिनियम, 1976
  28. सामूहिक विनाश के आयुध और उनकी परिदान प्रणाली (विधि-विरुद्ध क्रियाकलापों का प्रतिषेध) अधिनियम, 2005
  29. सिक्का निर्माण अधिनियम, 2011
  30. छोटे सिक्के (अपराध) अधिनियम, 1971
  31. धार्मिक संस्था (दुरुपयोग निवारण) अधिनियम, 1988
  32. दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961
  33. ओषधि और चमत्कारिक उपचार (आक्षेपणीय विज्ञापन) अधिनियम, 1954
  34. इनामी चिट और धन परिचालन स्कीम (पाबन्दी) अधिनियम, 1978
  35. पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991
  36. स्त्री अशिष्ट रूपण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1986
  37. लॉटरी (विनियमन) अधिनियम 1998
  38. पासपोर्ट अधिनियम, 1967
  39. चिट फंड अधिनियम, 1982

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18 मार्च 2025 को अभियोजन निदेशालय उत्तर प्रदेश की तरफ से FIR के सम्बन्ध में एक सर्कुलर जारी किया गया जिसमे स्पस्ट किया गया कि भविष्य में थाने पर FIR पंजीकरण करने से पूर्व यह अवश्य सुनिश्चित कर लिया जाय कि उक्त अपराध में आकर्षित होने वाले अधिनियम /धाराओं में FIR पंजीकृत किये जाने की व्यवस्था है अथवा परिवाद दाखिल किये जाने की |

उपरोक्तानुसार सुनिश्चित किये जाने के पश्चातही प्रकरण में FIR पंजीकृत कर विवेचना की जाए अन्यथा परिवाद दाखिल किये जाने के सम्बन्ध में अपेक्षित वैधानिक कार्यवाही की जाए | जिससे की भविष्य में किसी भी प्रकरण में अग्रेत्तर कार्यवाही के दौरान विधिक असंगता पैदा न हो |

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निष्कर्ष

उत्तर प्रदेश में FIR सम्बंधित नए नियम इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ के निर्णय के परिणाम स्वरुप आएं हैं | इनका उद्देश्य स्पष्ट रूप से आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार लाना तथा FIR के सम्बन्ध में भ्रम की स्थति को समाप्त कर पारदर्शिता लाना है |

जहाँ क़ानून में FIR का प्रावधान है वहाँ FIR हो तथा जहाँ परिवाद का प्रावधान है वहां पर परिवाद को किया जाना चाहिए | FIR के सम्बन्ध में नए दिशानिर्देशों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नए नियमों का उपयोग कितनी ईमानदारी और संतुलन के साथ किया जाता है |

यदि इसका पारदर्शिता और ईमानदारी से उपयोग किया गया तो यह न्याय व्यवस्था के लिए एक आदर्श मार्ग प्रस्तुत करेगा,लेकिन यदि इसका दुरूपयोग हुया तो यह न्याय के मार्ग में एक गंभीर बाधा बनेगा और आमजन में न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करेगा |

यह सत्य है कि न्याय के लिए न्यायिक प्रक्रिया समयबद्ध और निष्पक्ष होनी चाहिए अर्थात क़ानून का समुचित पालन होना चाहिए |

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अस्वीकरण :

यह लेख केवल शैक्षणिक और विधिक जन-जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है | यह किसी विशेष व्यक्ति, संस्था या मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं है | अधिक जानकारी के लिये योग्य अधिवक्ता से परामर्श आवश्यक है |

Note: Image credit: AI-generated illustration (created with ChatGPT)

 लेखक

Dr Raj Kumar
Founder- Human Rights Guru / Law Vs Reality

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