Discharge क्या है? सिद्धांत, प्रावधान और न्यायिक दृष्टिकोण

प्रस्तावना:

Discharge (उन्मोचन) न्यायक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण अंग है | न्यायक प्रक्रिया के दौरान किया गया Discharge आदेश अभियुक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण न्यायिक सुरक्षा प्रदान करता है | इस प्रक्रियातमक कानूनी प्रावधान का उद्देश्य किसी व्यक्ति को बिना पर्याप्त कानूनी आधार के लम्बी और कठोर कानूनी प्रक्रिया का सामना करने से बचाना है |

अंग्रेजी न्यायविद विलियम ब्लैकस्टोन का कहना था कि, ‘सौ गुनहगार छूट जाएं, लेकिन एक बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए।’ इसी सिद्धांत पर Discharge की मूल भावना आधारित है |

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Discharge क्या है?

सरल शब्दों में कहा जाए तो यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए आरोपों से तथा पत्रावली पर उपलब्ध सामिग्री के अवलोकन से प्रथम दृष्ट्या अपराध नहीं बनता है, तो न्यायालय आरोप तय करने से पहले ही आरोपी को मुकदद्मे से मुक्त कर सकती है | इस प्रावधान को Discharge कहा जाता है |

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Discharge के कानूनी प्रावधान क्या हैं ? CrPC vs BNSS

भारत में आपराधिक न्याय व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिए एक प्रक्रियात्मक विधि बनाई गई है जिसे दंड प्रक्रिया संहिता के नाम से जाना जाता है|

लेकिन 1 जुलाई 2024 से इसके स्थान पर नई प्रक्रिया विधि को अपनाया गया है, जिसे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के नाम से जाना जाता है | दंड प्रक्रिया संहिता तथा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 में Discharge के अलग -अलग प्रावधान दिए गए हैं :

1. सैशन ट्रायल में Discharge के लिए प्रावधानित धारा- 227

227..Discharge-यदि मामले के अभिलेख और उसके साथ दी गई दस्तावेजों पर विचार कर लेने पर, और इस निमित्त अभियुक्त और अभियोजन के निवेदन की सुनवाई कर लेने के पश्चात न्यायाधीश यह समझता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है तो वह अभियुक्त को Discharge कर देगा और ऐसा करने के अपने कारणों को लेखबद्ध करेगा |”

भारत में लागू नई विधि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 250 में इस Discharge के प्रावधान को निम्नवत वर्णित किया गया है :
250 .Discharge
(1) अभियुक्त धारा 232 के अधीन वाद की सुपुर्दगी की तारीख से साठ दिन की अवधि के भीतर Discharge के लिए आवेदन कर सकेगा |
(2) यदि मामले के अभिलेख और उसके साथ दी गई दस्तावेजों पर विचार कर लेने पर, और इस निमित्त अभियुक्त और अभियोजन के निवेदन की सुनवाई कर लेने के पश्चात न्यायाधीश यह समझता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है तो वह अभियुक्त को Discharge कर देगा और ऐसा करने के अपने कारणों को लेखबद्ध करेगा | “

2. अभियुक्त को कब Discharge किया जाएगा अंतर्गत धरा- 239

मजिस्ट्रटों द्वारा वारण्ट-मामलों के विचारण में पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित मामलों में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 239 के तहत अभियुक्त के Discharge का प्रावधान किया गया है |

“यदि धारा 173 के अधीन पुलिस रिपोर्ट और उसके साथ भेजे गए दस्तावेजों पर विचार कर लेने पर और अभियुक्त की ऐसी परिक्षा, यदि कोई हो, जैसी मजिस्ट्रेट आवश्यक समझे, कर लेने पर और अभियोजन और अभियुक्त को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात मजिस्ट्रेट अभियुक्त के विरुद्ध आरोप को निराधार समझता है तो वह उसे Discharge कर देगा और ऐसा करने के अपने कारण लेखबद्ध करेगा | “

भारत में लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 नई विधि की धारा 262 में इस Discharge के प्रावधान को निम्नवत वर्णित किया गया है :

BNSS की धारा 262 में अभियुक्त को कब Discharge किया जाता है ?

“(1)अभियुक्त धारा 230 के अधीन दस्तावेजों की प्रतियां देने की तारीक से 60 दिन की अवधि के भीतर उन्मोचन के लिए आवेदन कर सकेगा |

(2) यदि धारा 193 के अधीन पुलिस रिपोर्ट और उसके साथ भेजी गई दस्तावेजों पर विचार कर लेने पर और अभियुक्त की, या तो व्यक्तिगत रूप से या श्रव्य -दृश्य इलेक्ट्रॉनिक साधनो द्वारा, ऐसी परिक्षा, यदि कोई हो, जैसी मजिस्ट्रेट आवश्यक समझे, कर लेने पर और अभियोजन और अभियुक्त को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात मजिस्ट्रेट अभियुक्त के विरुद्ध आरोप को निराधार समझता है तो वह उसको Discharge कर देगा और ऐसा करने के कारण लेखबद्ध करेगा |”

3. BNSS की धारा 268 में अभियुक्त को कब Discharge किया जाता है ?

पुलिस रिपोर्ट से भिन्न आधार पर संस्थित मामलों में पुरानी दंड प्रक्रिया सहिता, 1973 की धारा 245 में अभियुक्त को Discharge करने का प्रावधान किया गया था लेकिन अब यह प्रावधान नई विधि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 268 में निम्नवत किया गया है :

“(1) यदि धारा 267 में निर्दिष्ट सब साक्ष्य लेने पर मजिस्ट्रेट का ,उन कारणों से ,जो लेखबद्ध किये जायेगे ,यह विचार है कि अभियुक्त के विरुद्ध ऐसा कोई मामला सिद्ध नहीं हुया है जो अखंडित रहने पर उसकी दोषसिद्धि के लिए समुचित आधार हो तो मजिस्ट्रेट उसको उन्मोचित कर देगा |

(2) इस धारा की कोई बात मजिस्ट्रेट को मामले के किसी पूर्वतन प्रक्रम में अभियुक्त को उस दशा में उन्मोचित करने से निवारित करने वाली न समझी जाएगी जिसमे ऐसा मजिस्ट्रेट ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किये जायेगे, यह विचार करता है कि आरोप निराधार है |”

उपरोक्त सभी धाराओं का मूल सिद्धांत है कि यदि न्यायालय के समक्ष उपलब्ध पत्रावली पर मौजूद सामग्री से प्रथम दृष्ट्या कोई मामला या अपराध नहीं बनता है तो आरोपी को मुकदद्मे से मुक्त कर दिया जाए |

यह न्यायिक सिद्धांत मुकदद्मे में अभियुक्त को अनावश्यक दीर्घकालीन विचारण से मुक्ति का रास्ता प्रदान करता है | यह सिद्धांत उन लोगों के लिए बरदान है जिन्होंने वास्तव में कोई अपराध नहीं किया है और उन्हें झूठा ही फसा दिया जाता है |

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Discharge आदेश देने से पहले अदालत क्या देखती है ?

डिस्चार्ज आदेश पारित करने से पहले अदालत के समक्ष कई कानूनी पहलू होते हैं, जिनके सम्बन्ध में अदालत की संतुष्टी के बाद ही डिस्चार्ज के आदेश के सम्बन्ध में निर्णय लिया जाता है |

अदालत देखती है कि क्या पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों से आरोपी के विरुद्ध लगाए गए अपराधों के तत्व प्रथम दृष्ट्या उपलब्ध हैं कि नहीं ?

क्या आरोप केवल अनुमान या अटकलबाजी पर आधारित है ? क्या पत्रावली पर उपलब्ध अभियोजन सामग्री किसी “गंभीर संदेह” को जन्म देती है ?

उपरोक्त का आंकलन करने के बाद यदि स्पष्ट होता है कि उत्तर नकारात्मक आता है तो मामला डिस्चार्ज का बन जाता है | अदालत डिस्चार्ज आदेश पारित कर देती है, लेकिन यह आदेश पारित करने के लिए अदालत को उसके पीछे के कारणों को इंगित करना होता है |

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Discharge का कानूनी महत्व क्या है ?

(i) अनावश्यक और फर्जी मुकदद्मों से सुरक्षा

डिस्चार्ज का न्यायिक सिद्धांत लोगों को अनावश्यक और फर्जी मुकदद्मों से बचाने में अत्यधिक मददगार साबित होता है | जिन लोगो ने कोई अपराध नहीं किया है तथा केवल झूठे आरोपों के आधार पर बर्षों तक चलने वाले विचारण के बोझ से बच जाते हैं |

निर्दोष लोगों के लिए यह सिद्धांत झूठे मुकदद्मों के विरुद्ध एक सुरक्षा कवच का काम करता है |

(ii )व्यक्तिगत स्वंत्रता की रक्षा

डिस्चार्ज का सिद्धांत सीधे -सीधे संविधान के अनुछेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत सुरक्षा से जुड़ा हुया है | इस लिए फर्जी मामलों की स्थति में यह जीवन और व्यक्तिगत सुरक्षा भी प्रदान करता है |

(iii) शुरुआती स्तर पर फर्जी मुकदद्मों की समाप्ति का साधन

आए दिन अख़बारों में खबरे आती रहती हैं कि फर्जी मुकदद्मा पाए जाने पर अदालत ने वादी के खिलाफ दिए मुकदद्मा दर्ज कराने के आदेश | इससे स्पष्ट हो जाता है कि आपराधिक न्याय व्यवस्था में फर्जी मुकदद्मों की कमी नहीं है |

न्यायालय तथा अभियुक्त के पास यह सिद्धांत एक ऐसा औजार है जिसके माध्य्म से न्यायालय फर्जी मुकदद्मों को ट्रायल की प्रारंभिक अवस्था में ही समाप्त कर न्यायालयों पर पड़ने वाले मुकदद्मों के अनावश्यक बोझ को कम कर देता है |

(iv) अभियोजन की जबाबदेही सुनिश्चित करना

यह सिद्धांत अभियोजन की जबाबदेही सुनिश्चित कराने के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है | यह जांच एजेंसियों या अभियोजन को स्मरण कराता है कि किसी मुकदद्मे को चलाने के लिए प्रथम दृष्टिया कुछ साक्ष्य भी होने चाहिए, सिर्फ खाली आपराधिक आरोपों से काम नहीं चलता है |

उदाहरण के लिए आरोप लगाया गया कि धारदार हतियार से टाँग काट दी गई है | लेकिन अदालत को धारदार हतियार से टांग काटने सम्बन्धी कोई साक्ष्य पत्रावली पर नहीं मिला तो अदालत अभियोजन का जबाब मांगते हुए मामले का निपटारा डिस्चार्ज के रूप में कर सकती है |

(v) कानूनी प्रक्रिया का दुरूपयोग रोकना

अनेक मामलों में देखा गया है एक पक्ष दुसरे पक्ष को सबक सिखाने के लिए या झूठा फ़साने के लिए फर्जी मुकदद्मे करा देता है | इससे कानूनी प्रक्रिया का दुरूपयोग होता हैं |

आपराधिक न्याय व्यवस्था में कानूनी प्रक्रिया के दुरूपयोग को गंभीरता से लिया जाता है | Discharg का सिद्धांत किसी भी मुकदद्मे की प्रारंभिक अवस्था में ही कानूनी प्रक्रिया के दुरूपयोग को रोकने में सक्षम है | डिस्चार्ज न्यायिक हस्तक्षेप का बेहतरीन साधन है |

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न्यायिक दृटिकोण

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने बार -बार विधि व्यवस्थाओं के माध्यम से स्थापित किया है कि न्यायालय के समक्ष उपलब्ध सामग्री में अपराध के तत्व नहीं दृश्टिगोचर हो रहे हैं तो आरोपी को मुकदद्मे के ट्रायल के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है | माननीय अदालत ने यह भी स्थापित किया है कि आरोप विचरण के दौरान “मिनी- ट्रायल” नहीं किया जाना चाहिए |

माननीय सर्वोच्च न्यायालय की विधि व्यवस्था तुहिन कुमार बिश्वास @ बुम्बा बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, 2025 एससीसी ऑनलाइन एससी 2604 में यह दोहराया गया कि साक्ष्य बन सकने वाली सामग्री पर आधारित मजबूत संदेह के अभाव में, आरोपी को Discharge किया जा सकता है | साथ ही इस बात पर बल दिया कि न्यायालय को Discharge करने /आरोप लगाने से सम्बंधित स्थापित सिद्धांतों को रेखांकित और लागू करना चाहिए |

Discharge की अवधारणा को व्यवहारिक रूप से समझने के लिए Delhi Excise Policy Case का विश्लेषण देखें, जहाँ न्यायालय ने आरोप निर्धारण से पूर्व साक्ष्यों की पर्याप्तता पर विस्तार से विचार किया।

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निष्कर्ष

किसी भी मुकदद्मे में आरोपी के लिए Discharge आदेश एक फौरी तथा तकनीकी राहत नहीं है, बल्कि आपराधिक न्याय व्यवस्था के तहत यह एक संवैधानिक सुरक्षा तंत्र के अलावा मानव अधिकार भी है |

सर्वोच्च न्यायालय की विधि व्यवस्था संजय कुमार राय बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य में स्थापित किया गया है कि Discharge अभियुक्तों के लिए एक मूल्यवान अधिकार है |

Discharge सुनिश्चित करता है कि मुकदद्मा खाली आरोपों पर नहीं चल सकता है उसके लिए गंभीर संदेह होना चाहिए तथा निर्दोष व्यक्ति के विरुद्ध कानूनी प्रक्रिया का दुरूपयोग नहीं किया जा सकता है |

इसके अतिरिक्त न्यायिक प्रणाली को भी अनावश्यक और फर्जी मुकदद्मे प्रारम्भिक अवस्था में ही समाप्त करने की शक्ति प्रदान करता है | जिससे न्याय व्यवस्था मुकदद्मों के अनावश्यक बोझ से बच सके |

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Discharge( उन्मोचन ) पर अक्सर पूछे जाने प्रश्न ( FAQ):

प्रश्न 1 :Discharge( उन्मोचन) क्या होता है ?

उत्तर : Discharge( उन्मोचन ) आपराधिक प्रक्रिया विधि का वह चरण है जिसमे अदालत अपने यहाँ उपलब्ध रिकॉर्ड पर यह पाती है कि आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोप उपलब्ध रिकॉर्ड पर सामिग्री से निर्मित नहीं होते हैं तो अदालत आरोपी को Discharge आदेश द्वारा ट्रायल का सामना करने से मुक्त कर देती है |

प्रश्न 2 :Discharge और Acquittal में क्या अंतर है ?

उत्तर : Discharge में आरोपी को मुकदद्मे की शुरूआत से पहले ही मुकदद्मे का ट्रायल पूर्ण होने से पहले ही मुक्त कर दिया जाता है, जबकि Acquittal मुकदद्मे की पूरी सवाई के बाद होता है | Discharge में आरोपी को ट्रायल का सामना नहीं करना पड़ता है |

प्रश्न 3 : Discharge किन प्रावधानों के तहत दिया जाता है ?

उत्तर : भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 में मुख्य प्रावधान निम्नवत हैं :
(i ) धारा 250 -सैशन ट्रायल में Discharge के लिए प्रावधानित
(ii) धारा 262 – मजिस्ट्रटों द्वारा वारण्ट-मामलों के विचारण में पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित मामलों में
(iii) धारा 268 – वारण्ट-मामलों में पुलिस रिपोर्ट से भिन्न आधार (शिकायत ) पर संस्थित मामलों में

प्रश्न 4 : Discharge का निर्णय अदालत किस आधार पर करती है ?

उत्तर : इस स्तर पर अदालत सिर्फ यह देखती है कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत सामग्री से प्रथम दृष्ट्या अपराध का मामला बनता है कि नहीं | यदि सामग्री से अपराध के आवश्यक तत्वों की पुष्टि नहीं होती है तो आरोपी को उन्मोचित कर दिया जाता है |

प्रश्न 5: क्या Discharge का तात्पर्य आरोपी का निर्दोष होना है ?

उत्तर : नहीं | इसका मतलब सिर्फ इतना होता है कि मुकदद्मे को आगे चलाने के लिए प्रथम दृष्ट्या पर्याप्त आधार नहीं मिलता है | यह अंतिम रूप से निर्दोष होने का निर्णय नहीं होता है |

प्रश्न 6 :क्या Discharge को आरोपी का बहुमूल्य अधिकार माना जाता है ?

उत्तर : हाँ | कई विधि व्यवस्थाओं में डिस्चार्ज को आरोपी का बहुमूल्य अधिकार माना गया है |

प्रश्न 7 : क्या दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल का शराब नीति से जुड़ा मामला Discharge से जुड़ा है ?
उत्तर : हाँ | शराब नीति से जुड़ा मामला Discharge से जुड़ा है | इस मामले में अदालत ने सभी 23 आरोपियों को डिस्चार्ज कर दिया गया है |

अस्वीकरण :

यह लेख केवल शैक्षणिक और जन-जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है | यह किसी विशेष व्यक्ति, संस्था या मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं है | अधिक जानकारी के लिये योग्य अधिवक्ता से परामर्श आवश्यक है |

Note: Image credit: AI-generated illustration (created with ChatGPT)

 लेखक

Dr Raj Kumar
Founder, HumanRightsGuru / LawVsReality

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