
प्रस्तावना
क्या किसी शादी से पहले चल रहे Live-in-Relationship को छुपाकर शादी करना कोई गुनाह है ? हाल ही मे झारखंड उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय Sidharth Rao @ Rahul vs Priyanka Sahi में स्थापित किया गया है कि विवाह से पहले चल रहे Live-in-Relationship जैसे महत्वपूर्ण तथ्यों को एक पक्ष द्वारा छुपाया जाना दूसरे पक्ष की सहमति पर सीधा प्रभाव डालता है |
इस विधिव्यवस्था से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता पत्नी ने आरोप लगाया कि प्रतिवादी पति ने अपने पूर्व Live-in-Relationship के बारे में विवाह से पहले कोई जानकारी नहीं दी | याचिकाकर्ता की याचिका पर ट्रायल कोर्ट ने इसे धोखा मानते हुए विवाह को निरस्त कर दिया और प्रतिवादी को आदेश दिया कि वह याचिकाकर्ता को स्थाई गुजारा भत्ता 30 लाख रूपये अदा करे |
इसके बाद ट्रायल कोर्ट के निर्णय को चुनौती देते हुए दोनो याचिकाकर्ता तथा प्रतिवादी झारखंड उच्च न्यायालय पहुंचे और दोनों ने अपील दायर कीं |
जहाँ उच्च न्यायालय ने प्रतिवादी के विवाह निरस्तीकरण की चुनौती को अस्वीकार करते हुए विवाह निरस्तीकरण को बरकरार रखा तथा याचिकाकर्ता की अपील को स्वीकारते हुए स्थायी गुजारा भत्ता बढ़ाकर 50 लाख रुपये कर दिया।
इससे स्पष्ट होता है कि एक पक्ष द्वारा शादी से पूर्व के Live-in-Relationship महत्वपूर्ण तथ्य को दूसरे पक्ष को न बताना विवाह की सहमति पर सीधा प्रभाव डालता है, इस लिए यह धोखाधड़ी की श्रेणी में सुमार किया जाएगा |
यह भी पढ़ें :Discharge क्या है? सिद्धांत, प्रावधान और न्यायिक दृष्टिकोण
Live-in-Relationship क्या है ?
किसी भी भारतीय क़ानून के तहत Live-in-Relationship को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है अर्थात भारत में इसे लेकर कोई भी क़ानून नहीं है |
लेकिन सामान्य रूप से दो प्रौढ़ महिला और पुरुष बिना विवाह किये हुए एक दुसरे के साथ पति -पत्नी की तरह रहने का फैसला करते हैं और लम्बे समय तक साथ -साथ रहते हैं तो इन संबंधों को Live-in-Relationship के दायरे में माना जाता है |
भारत में सबसे पहले वर्ष 2010 में महिलाओं को घरेलू हिंसा से सुरक्षा प्रदान करने के लिए घरेलू हिंसा कानून Live-in-Relationship को आधिकारित तौर विधिक मान्यता प्रदान की गई |
यह भी पढ़ें :डिजिटल अरेस्ट : मानव अधिकारों पर एक अदृश्य हमला
Live-in-Relationship से संबंधित प्रकरण के महत्वपूर्ण तथ्य
इस प्रकरण से जुड़े दोनों पक्षकारों याचिकाकर्ता प्रियंका साही तथा प्रतिवादी सिद्धार्थ उर्फ राहुल का विवाह 02.12.2015 को हिन्दू रीती-रिवाज के अनुसार गोरखपुर में सप्पन्न हुया था |
विवाह के समय याचिकाकर्ता के परिवार ने प्रतिवादी और उसके परिवार को लगभग 11 ,20, 000 /-रूपये के उपहार दिए थे जिसमे नकद,गहने,बर्तन,फर्नीचर और कार आदि शामिल थे | इसके अलावा अन्य बैंक ट्रांसफर भी थे |
विवाह के बाद याचिकाकर्ता अपने ससुराल पहुंची,जहां उसे प्रतिवादी और उसके परिवार की तरफ से मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा |
याचिकाकर्ता को उसकी शादी से पहले के प्रतिवादी के किसी अन्य महिला के साथ Live -in -Relationship के बारे में भी जानकारी हुई |
प्रतिवादी और उसके परिजनों ने याचिकाकर्ता और उसके परिवार वालों से अतिरिक्त दहेज़ की मांग की | इस मांग को पूरा करने से इंकार के बाद याचिकाकर्ता को अनवरत यातनाएं दी जाती रहीं |
प्रतिवादी प्रारम्भ से ही शराब की लत का शिकार था, जिसके कारण भी याचिकर्ता का वैवाहिक जीवन कठिनाइयों से भर गया तथा असह्याय हो गया |
याचिकाकर्ता ने अपने वैवाहिक जीवन को बचाने के कई प्रयास भी किये, लेकिन प्रतिवादी और उसके परिजनों के व्यवहार में कोई सुधार नहीं हुया |
आखिर में विवाह के मात्र 3 महीने बाद ही 02.03.2016 को याचिकाकर्ता को उसकी ससुराल से निकाल दिया गया | जिसके बाद उसने घर लौटकर अपने माता -पिता से मामले की शिकायत की |
जिसके बाद याचिकाकर्ता ने Hindu Marriage Act, 1955 की धारा 12(1)(c) के तहत विवाह को रद्द करने, स्थाई गुजारा भत्ता और भरण पोषण की मांग के लिए अदालत में याचिका डाली | इसके साथ ही विवाह में दी गई संम्पत्तियों और उपहारों की वापसी के लिए भी याचिका डाली गई |
अदालत द्वारा कई बार नोटिस जारी होने के बाबजूद प्रतिवादी न अदालत के समक्ष उपस्थित हुया और न ही उसने कोई लिखित जबाब दिया, परिणाम स्वरुप, परिवार न्यायालय ने 29.07.2016 ने एक्सपार्टी आदेश पारित कर दिया |
दिनाक 16.02.2017 को परिवार न्यायालय ने याचिकाकर्ता के पक्ष में निर्णय देते हुए विवाह को निरस्त कर दिया तथा प्रतिवादी अर्थात पति को 30,00,000/- रुपये स्थाई गुजारा भत्ता पत्नी को दिए जाने के आदेश पारित कर दिए |
इस आदेश से व्यथित याचिकर्ता पत्नी ने F.A. 213/2019 में आदेश को चुनौती दी, जिसमे गुजारा भत्ता की राशि को अपर्याप्त मानते हुए पुनर्विचार की याचना की गई |
दूसरी ओर पति ने इसी आदेश के विरुद्ध F.A. 23/2018 में विवाह रद्द करने के निर्णय को चुनौती दी गई | ये दोनों अपीलें झारखंड उच्च न्यायालय मे दाख़िल की गईं |
जिनकी एक साथ सुनवाई के बाद दोनों का एक ही निर्णय दिनांक 21/01/2026 को पारित किया गया है |
यह भी पढ़ें :प्रेम के नाम पर पॉक्सो से मुक्ति: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
Live -in -Relationship को छुपाने पर हिन्दू विवाह अधिनियम,1955 की धारा 12 (1) (c) क्या कहती है ?
हिन्दू विवाह अधिनियम,1955 की यह धारा किसी हिन्दू विवाह को न्यायालय द्वारा निरस्त किये जाने से सम्बंधित है | जब विवाह के किसी पक्षकार को विवाह के बाद यह जानकारी होती है कि उसकी विवाह के लिए ली गई सहमति विवाह से पूर्व कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों जैसे कि Live-in-Relationship को छुपा कर ली गई है |
पीड़ित पक्षकार को धारा 12 (1) (c)के तहत न्यायालय से अपने विवाह को निरस्त करवाने का अधिकार प्राप्त होता है जिसके सम्बन्ध में पीड़ित व्यक्ति अपनी शिकायत लेकर न्यायालय से विधिक उपचार प्राप्त कर सकता है |
हिन्दू विवाह अधिनियम,1955 की धारा 12 (1) (c) को निम्नवत परिभाषित किया गया है:-
“12 .शून्यकरणीय विवाह (1 )कोई भी विवाह, वह इस अधिनियम के प्रारम्भ के चाहे पूर्व अनुश्ठाषित हुया हो चाहे पश्चात, निम्न लिखित आधारों में से किसी पर भी शून्यकरणीय (voidable) होगा और अकृतता (nullity) की डिग्री द्वारा वातिल (annulled) किया जा सकेगा |
(c) कि अर्जीदार ( petitioner) की सम्मति प्रत्यर्थी (responden) से सम्बंधित किसी तात्विक तत्व (material fact) या परिस्थिति (circumstances) के द्वारा कपट पूर्वक अभिप्राप्त की गई हो |”
अभी हल ही में झारखंड उच्च न्यायालय द्वारा दी गई विधि व्यवस्था Sidharth Rao @ Rahul vs Priyanka Sahi के पेराग्राफ 42 में कहा है कि,
“42. हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 12 में ऐसे आधार शामिल हैं जिन पर विवाह को अमान्य घोषित किया जा सकता है और अमान्य होने की डिक्री द्वारा रद्द किया जा सकता है।
उक्त धारा की उपधारा (1) के खंड (ग) में ऐसे निरस्तीकरण का उपबंध है, जब याचिकाकर्ता की सहमति उक्त खंड में उल्लिखित परिस्थितियों में बलपूर्वक या धोखाधड़ी द्वारा प्राप्त की जाती है।
यह कानून की स्थिर स्थिति है कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 12 (1) (सी) धोखाधड़ी से सामान्य तरीके से नहीं निपटती है, न ही हर गलत निरूपण या छिपाने से संबंधित है, जिसका उद्देश्य धोखाधड़ी हो सकता है।”
यह भी पढ़ें : भारत में फर्जी विश्वविद्यालयों पर कार्रवाई: पूरी सूची 2026 और UGC रिपोर्ट
Live -in -Relationship के महत्वपूर्ण तथ्य को छुपाने पर न्यायिक दृष्टिकोण
Sidharth Rao @ Rahul vs Priyanka Sahi मामले में कोर्ट ने स्थापित किया है पति द्वारा अपने किसी अन्य महिला के साथ Live-in-Relationship के महत्वपूर्ण तथ्य को छुपाना विवाह की सहमति को प्रभावित करने वाला माना गया है |
इस लिए विवाह निरस्तीकरण योग्य है साथ ही न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्ति की गरिमा बनाये रखना आवश्यक है | विवाह केवल सामाजिक या धार्मिक कॉन्ट्रैक्ट नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत अधिकारों से जुड़ा संवैधानिक मामला है|
यह भी पढ़ें : रु 54,000 करोड़ का Digital Fraud: Supreme Court ने क्यों कहा “लूट या डैकेती”?
Live -in -Relationship छुपाने पर गुजारा भत्ता तय करने के नियम
इस निर्णय मे Rajnesh v. Neha & Anr के आधार पर स्थाइ गुजारा भत्ता अन्तिम तौर पर 50 लाख दिया गया है इस रकम को 5 किस्तों में भुगतान करने के लिए कहा गया |
इसे एकमुश्त समाधान माना गया जिससे भविष्य में कोई किसी प्रकार का विवाद न हो | इस आदेश की सबसे बड़ी बात है कि स्थाई गुजारा भत्ता तय करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की विधि व्यवस्था Rajnesh v. Neha & Anr में गुजारा भत्ता तय करने के लिए न्यायालयों हेतु दिए गए दिशा निर्देशों का अनुसरण किया गया जो इस निर्णय का अत्यधिक महत्वपूर्ण तत्व है |
स्थायी गुजारा भत्ता के मुद्दे को माननीय सर्वोच्च न्यायालय की विधि व्यवस्था Rajnesh v. Neha & Anr. (2021) 2 SCC 324 में विस्तृत रूप से निपटाया गया है। जो क्षेत्र में अग्रणी विधि व्यवस्था है, जिसमें माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्थायी गुजारा भत्ता/रखरखाव देने में मामले के सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए कुछ निर्देश दिए हैं और स्थायी गुजारा भत्ता का आकलन करने के लिए मापदंड भी दिए गए हैं।
इन दिशा-निर्देशों के अनुसार न्यायालय ने दोनों पक्षों की आय, सामाजिक स्थिति, वैवाहिक परिस्थितियों तथा विवाह से पूर्व या बाद के संबंधों, जैसे कि Live-in-Relationship से जुड़े तथ्यों को भी समग्र परिस्थितियों के रूप में ध्यान में रखा। यही इस निर्णय का अत्यंत महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय तत्व है।
यह भी पढ़ें :भारत में फर्जी विश्वविद्यालयों पर कार्रवाई 2026: शिक्षा का अधिकार, मानवाधिकार और कानूनी सच्चाई
निष्कर्ष : Live-in-Relationship को विवाह से पूर्व छुपाने पर सीख
निर्णय से स्पष्ट हुआ है कि किसी भी विवाह के लिए हिन्दू विवाह अधिनियम की 1955 की धारा १२(1) (C) के अनुसार सहमति वास्तविक और स्वतंत्र होनी चाहिए |
यदि विवाह के लिए दी गई सहमति किसी प्रकार के धोखे, दबाव या महत्वपूर्ण तथ्यों को छुपाकर प्राप्त की गई हो, तो ऐसी सहमति वैध नहीं मानी जाती।
किसी भी महत्वपूर्ण तथ्य—जैसे कि विवाह से पूर्व किसी अन्य व्यक्ति के साथ Live-in-Relationship में रहना और उस तथ्य को जानबूझकर छुपाना—को सहमति को प्रभावित करने वाला माना जा सकता है।जिसके कारण विवाह निरस्त्रीकरण योग्य बनता है |
ऐसी परिस्थितियों में विवाह को न्यायालय द्वारा निरस्त्रीकरण योग्य (Voidable) माना जा सकता है और पीड़ित पक्षकार अदालत में याचिका दायर कर विवाह को निरस्त कराने की मांग कर सकता है।
यह भी पढ़ें : Delhi Excise Policy Case में Kejriwal Discharge 2026: मानवाधिकार दृष्टि
Live-in-Relationship:अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1. क्या Live -in -Relationship छुपाकर शादी करना विधिक रूप से धोका माना जा सकता है ?
उत्तर : हाँ , यदि विवाह से पहले किसी व्यक्ति ने अपने पूर्व के Live -in -Relationship जैसे महत्वपूर्ण तथ्य को छुपाया है तथा इससे दूसरे पक्ष की सहमति प्रभावित होती है, ऐसा साबित हो जाए, तो अदालत इसे धोखे की श्रेणी में मान सकती है |
प्रश्न 2 . क्या Live -in -Relationship छुपाकर शादी करने पर पीड़ित पक्षकार विवाह निरस्त करने के लिए याचिका दायर कर सकता है ?
उत्तर : हाँ | निश्चित रूप से ऐसी स्तिथि में पीड़ित पक्षकार विवाह निरस्त करने के लिए याचिका दायर कर सकता है |
प्रश्न 3.Live -in -Relationship छुपाकर शादी करने पर किस कानून के तहत विवाह निरस्त किया जा सकता है ?
उत्तर : इस प्रकार के मामले में Hindu Marriage Act, 1955 की धारा 12(1)(c) के तहत विवाह निरस्त किया जा सकता है |
प्रश्न 4 . क्या भारत में Live -in -Relationship अवैध है ?
उत्तर : नहीं | भारत में Live -in -Relationship दो प्रौढ़ व्यक्तियों के बीच उनकी स्वतंत्र सहमति से वैध है |
प्रश्न 5 . विवाह निरस्त्रीकरण (Annulment) और तलाक (Divorce) में क्या अंतर है ?
उत्तर : विवाह निरस्त्रीकरण (Annulment) में अदालत यह तय करती है कि विवाह पहले से ही कानूनी नहीं था तथा तलाक (Divorce) में विवाह प्रारम्भ से ही वैध होता है तथा बाद में समाप्त किया जाता है |
प्रश्न 6 .क्या अदालत विवाह निरस्त्रीकरण के बाद एकमुश्त गुजारा भत्ता तय कर सकती है ?
उत्तर : हाँ | अदालत विवाह निरस्त्रीकरण के बाद Rajnesh v. Neha में दिए गए दिशा निर्देशों के अनुपालन में एकमुश्त गुजारा भत्ता तय कर सकती है
यह भी पढ़ें :Delhi Excise Policy Case: Discharge Order और Article 21 का मानवाधिकार विश्लेषण
अस्वीकरण :
यह लेख केवल शैक्षणिक और जन-जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है | यह किसी विशेष व्यक्ति, संस्था या मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं है | अधिक जानकारी के लिये योग्य अधिवक्ता से परामर्श आवश्यक है |
Note: Image credit: AI-generated illustration (created with ChatGPT)
लेखक
Dr Raj Kumar
Founder- HumanRightsGuru / LawVsReality
1 thought on “Live-in-Relationship छुपाकर शादी करना धोखा,2026? कोर्ट ने रद्द किया विवाह – जानिए पूरा कानून”