क्या धारा 498A का दुरुपयोग हो रहा है? — Law vs Reality

धारा 498A के दुरुपयोग पर आधारित ग्राफिक जिसमें Law vs Reality दिखाया गया है, एक तरफ न्याय का प्रतीक और दूसरी तरफ 498A misuse की स्थिति दर्शाई गई है
धारा 498A का कानून महिलाओं की सुरक्षा के लिए या निर्दोषों पर दबाव का माध्यम?

प्रस्तावना

भारतीय समाज दहेज जैसी गंभीर बुराई से लम्बे समय से जूझता आ रहा है | विवाह के दौरान मनमाफिक दहेज़ न मिलने के कारण अनेक लड़कियों को क्रूरता का सामना करना पड़ता है |

इसी समस्या के समाधान के लिए धारा 498A भारतीय दंड संहिता (वर्तमान में 85 BNS) को लागू किया गया | इस प्रावधान का मुख्य उद्देश्य विवाहित महिलाओं को उनके पति या उनके रिश्तेदारों द्वारा की जाने वाली क्रूरता से सुरक्षा प्रदान करना है |

लेकिन समय के साथ -साथ इस क़ानून के दुरुपयोग के उदाहरण समाज के सामने आने लगे | समाज के सामने प्रश्न पैदा हो गया कि क्या इस क़ानून का दुरुपयोग वास्तव में होने लगा है ?

बस यही वह केंद्र बिंदु है, जहाँ “Law vs Reality” को जानना जरूरी हो जाता है | कानून का मकसद महिलाओं की क्रूरता से सुरक्षा सुनिश्चित करना तथा साथ ही निर्दोषों को न्याय मुहैया कराना है |

सुप्रीम कोर्ट की विधि व्यवस्था Preeti Gupta v. State of Jharkhand, (2010) 7 SCC 667 में माननीय न्यायालय ने टिप्णी की है कि,

“30. यह सर्वविदित तथ्य है कि आईपीसी की धारा 498A के तहत दर्ज अधिकांश शिकायतें तुच्छ मुद्दों पर बिना उचित विचार-विमर्श के आवेश में आकर दर्ज की जाती हैं। हमें ऐसी कई शिकायतें मिलती हैं जो वास्तविक भी नहीं होतीं और गलत इरादों से दर्ज की जाती हैं। साथ ही, दहेज उत्पीड़न के वास्तविक मामलों की बढ़ती संख्या भी गंभीर चिंता का विषय है।”

न्याय सिर्फ पीड़ितों के लिए महत्वपूर्ण नहीं होता है ,बल्कि यह निर्दोषों के लिए भी समान रूप से महत्वपूर्ण होता है | इस लेख में आईपीसी की धारा 498 A के दुरुपयोग को पीड़ित तथा निर्दोष आरोपितों के सन्दर्भ में न्यायालयीय दृष्टिकोण से समझने का प्रयास किया गया है |

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धारा 498A का दुरुपयोग: एक गंभीर तथा वास्तविक चिंता

भारतीय दंड संहिता की धारा 498 A का उद्देश्य विवाहित महिलाओं को उनके विरुद्ध होने वाली क्रूरता से सुरक्षा प्रदान करना है | इस कानून के लागू होने के बाद महिलाओं को मिले व्यापक अधिकारों का कुछ मामलों में गलत उपयोग भी देखने को मिलने लगा |

कई मामलो में देखा गया कि लड़के के रिस्तेदार विदेश में रह रहे हैं और उन्हें भी इस अपराध में आरोपित कर दिया गया | यही नहीं अनेक मामलों में इस प्रकार के आरोप सिर्फ इस लिए लगाए जाते हैं कि पति तथा उसके परिवार और रिस्तेदार से अनुचित लाभ लिया जा सके ,उनके ऊपर अनुचित दबाब बनाया जा सके या उनसे बदला लिया जा सके |

इस प्रकार भारतीय दंड संहिता की धारा 498A को कुछ महिलाएं एक हथियार के रूप में उपयोग करती प्रतीत होती हैं |

भारत में धारा 498A से जुड़े झूठे मामलों की संख्या में बढ़ोत्तरी को लेकर चिंता सामने आई है | यह मुद्दा अब केवल सामाजिक बहस का नहीं है, बल्कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक ने इस मुद्दे की गंभीरता को लेकर टिप्पणी की है |

कई मामलों में देखा गया है कि न सिर्फ पति को बल्कि उसके बृद्ध माता -पिता और दूर के रिश्तेदारों को भी धारा 498A के आरोपों में शामिल कर लिया जाता है | जिसके कारण उन्हें बिना किसी कुसूर के एक लम्बी और कठोर कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है |

इस प्रवृति का सीधा असर क़ानून के मूल उद्देश्य पर भी पड़ता है, जिसके तहत इस क़ानून का वास्तविक उद्देश्य पीड़ित महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करना है |

जब धारा 498A से जुड़े झूठे और बढ़ाचढ़ा कर बनाये गए मामलो की संख्या में इजाफा होता है, तो वास्तविक रूप से पीड़ित होने वाली महिलाओं के मामलो की विश्वस्नीयता को भी संदिग्ध रूप से देखा जाने लगता है |

सोशल मीडिया के इस युग में महिलाएं इस प्रावधान के तहत मिलने वाले कानूनी अधिकारों से भली-भांति परिचित हो रही हैं | चूकि धारा 498A के अधीन अपराध संज्ञेय है तथा गैर जमानतीय है |

इसलिए मात्र एक शिकायत पर कार्यवाही संभव हो जाती है | इस कारण आरोपित पति तथा अन्य परिजनों एवं रिश्तेदारों पर तत्काल दबाब निर्मित हो जाता है |

इस प्रकार देखा जाए तो महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाया गया क़ानून आज -कल पुरुषों के विरुद्ध आरोपों के आधार पर समझौते, तलाक, या आर्थिक मांगों को पूरा करने का एक हथियार बन गया है अर्थात कुछ परिस्थितयों में अपने मूल उद्देश्य, महिलाओं की सुरक्षा करना, से हटकर दुरुपयोग का साधन बन गया है |

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धारा 498A क्या कहती है?

भारतीय दंड सहिता की धारा 498A के अनुसार—जो कोई ,किसी स्त्री का पति या पति का नातेदार होते हुए ,ऐसी स्त्री के प्रति क्रूरता करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि 3 वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा |

स्पष्टीकरण:

इस धारा में क्रूरता को निम्नवत स्पष्ट किया गया है:

(क) जानबूझ कर किया गया कोई आचरण जो ऐसी प्रकृति का है जिससे उस स्त्री को आत्महत्या करने के लिए प्रेरित करने की या उस स्त्री के जीवन, अंग या स्वास्थ्य को (जो चाहे मानसिक हो या शारीरिक ) गंभीर क्षति या ख़तरा कारित करने की संभावना है :या

(ख) किसी स्त्री को तंग करना ,जहाँ उसे या उसके सम्बंधित किसी सम्पति या मूल्यवान प्रतिभूति के लिए किसी विधि विरुद्ध मांग को पूरा करने के लिए प्रपीड़ित करने की दृस्टि से या उसके अथवा उससे सम्बंधित किसी व्यक्ति के ऐसी माँग पूरी करने में असफल रहने के कारण इस प्रकार तंग किया जा रहा है |

नए क़ानून BNS में इसे धारा 85 के तहत रखा गया है | यह एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध है |

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498A पर दुरुपयोग की बहस क्यों उठी?

1. सम्पूर्ण परिवार को आरोपी बनाना

कई मामलो में पति ही नहीं ,बल्कि सम्पूर्ण परिवार को जिसमे उसके माता-पिता, भाई-बहन और दूर के रिश्तेदारों भी शामिल होते हैं ,को भी एक साथ आरोपी बना दिया जाता है, चाहे उनकी क्रूरता के अपराध में किसी भी रूप में भूमिका न हो।

जैसा कि विधि व्यवस्था Preeti Gupta v. State of Jharkhand में बताया गया है कि पति और उसके परिजनों तथा रिश्तेदारों को आरोपी बनाने की प्रवृत्ति भी आम है।

2. वैवाहिक विवाद का आपराधिक रूपांतरण

अनेक बार पति -पत्नी के बीच साधारण घरेलू मामूली कहा -सुनी को भी 498A के रूप में आपराधिक मुकदद्मे का रूप दे दिया जाता है, जससे उनके बीच सुलह की सम्भावनाये कम हो जाती हैं |

3. 498A की घटना संबन्धी अतिरंजित संस्करण

सर्वोच्च न्यायालय ने विधि व्यवस्था Preeti Gupta v. State of Jharkhand में स्पष्ट किया है कि यह भी सर्वविदित तथ्य है कि कई शिकायतों में घटना के अतिरंजित विवरण मिलते हैं। बड़ी संख्या में मामलों में अत्यधिक आरोप लगाने की प्रवृत्ति भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

4.दबाव बनाने के साधन के रूप में 498A का उपयोग

कुछ मामलो में विवाहित महिला की ओर से पति तथा उसके समस्त परिवार के विरुद्ध 498A का मुकदद्मा सिर्फ इस उद्देश्य से लगाया जाता कि पति तथा उसके परिवारीजनों पर अपने मनमाफिक उपचार जैसे कि तलाक या गुजारा भाता या आर्थिक समझौते के लिए दबाब बनाया जा सके |

महिलाओं द्वारा दबाव बनाने के साधन के रूप में 498A का उपयोग एक महत्वपूर्ण चलन बन गया है | जिसके कारण भी 498A पर दुरुपयोग की बहस प्रारम्भ हुई है |

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498A पर सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण (Case Laws)

Preeti Gupta v. State of Jharkhand

इस विधि व्यवस्था में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि,

“33.न्याय का अंतिम उद्देश्य सत्य का पता लगाना, दोषियों को दंडित करना और निर्दोषों की रक्षा करना है। इन शिकायतों में से अधिकांश में सत्य का पता लगाना एक अत्यंत कठिन कार्य है।

पति और उसके सभी करीबी रिश्तेदारों को फंसाने की प्रवृत्ति भी आम है। कई बार, आपराधिक मुकदमे की समाप्ति के बाद भी, वास्तविक सत्य का पता लगाना मुश्किल हो जाता है।

न्यायालयों को इन शिकायतों से निपटते समय अत्यंत सतर्क और सावधान रहना चाहिए और वैवाहिक मामलों से निपटते समय व्यावहारिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखना चाहिए।

पति के उन करीबी रिश्तेदारों के उत्पीड़न के आरोप, जो अलग-अलग शहरों में रहते थे और शिकायतकर्ता के निवास स्थान पर कभी नहीं आते थे या बहुत कम आते थे, का स्वरूप बिल्कुल अलग होगा।

शिकायत में लगाए गए आरोपों की गहन जांच-पड़ताल आवश्यक है। अनुभव बताता है कि लंबे और जटिल आपराधिक मुकदमे पक्षों के बीच संबंधों में द्वेष, कटुता और कड़वाहट पैदा करते हैं।

यह सर्वविदित तथ्य है कि शिकायतकर्ता द्वारा दायर मामलों में यदि पति या उसके रिश्तेदारों को कुछ दिनों के लिए भी जेल में रहना पड़े, तो सौहार्दपूर्ण समझौते की सारी संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं। यह कष्टदायी प्रक्रिया अत्यंत लंबी और पीड़ादायक होती है।”

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सुशील कुमार शर्मा बनाम भारत संघ, प्रीति गुप्ता बनाम झारखंड राज्य, सावित्री देवी बनाम रमेश चंद के हवाले से स्पष्ट होता है कि 498 A के प्रावधान का दुरुपयोग न्यायिक रूप से स्वीकार किया गया है और ऐसे दुरुपयोग को रोकने के लिए उपाय अपनाने की आवश्यकता है।

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कानूनी प्रावधान का दुरुपयोग :कानूनी सुधार की जरूरत

जैसा कि मौलवी हुसैन हाजी अब्राहम उमरजी बनाम गुजरात राज्य, [2004] 6 एससीसी 672, में देखा गया है, किसी प्रावधान की व्याख्या करते समय न्यायालय केवल कानून की व्याख्या करता है, उसे लागू नहीं कर सकता।

यदि कानून के किसी प्रावधान का दुरुपयोग किया जाता है और विधि प्रक्रिया का दुरुपयोग होता है, तो विधायिका को आवश्यकता समझे तो उसमें संशोधन, परिवर्तन या निरस्त करने का अधिकार है।

498A Law Reform की जरूरत: Supreme Court ने विधायिका को दिया संकेत

सर्वोच्च न्यायालय ने विधि व्यवस्था Preeti Gupta v. State of Jharkhand में 498A के संबन्धित मुकदद्मों पर चिंता और कानूनी सुधार की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा है कि,

“आपराधिक मुकदमे सभी संबंधित पक्षों के लिए अत्यधिक पीड़ा का कारण बनते हैं। मुकदमे में अंततः बरी हो जाने पर भीअपमान और बदनामी के गहरे घाव नहीं मिट पाते। दुर्भाग्यवश, इन शिकायतों की भारी संख्या ने न केवल अदालतों को आच्छादित कर दिया है, बल्कि समाज में व्यापक अशांति भी पैदा कर दी है, जिससे शांति, सद्भाव और सुख प्रभावित हो रहे हैं।

अब समय आ गया है कि विधायिका व्यावहारिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए मौजूदा कानून में उचित बदलाव करे। विधायिका के लिए यह अनिवार्य है कि वह जागरूक जनमत और व्यावहारिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए कानून के प्रासंगिक प्रावधानों में आवश्यक बदलाव करे।

हम रजिस्ट्री को निर्देश देते हैं कि वह इस फैसले की एक प्रति विधि आयोग और भारत सरकार के केंद्रीय विधि सचिव को भेजे, जो इसे माननीय विधि एवं न्याय मंत्री के समक्ष समाज के व्यापक हित में उचित कदम उठाने हेतु प्रस्तुत कर सकें।”

निष्कर्ष

विवाहित महिलाओं के संरक्षण के लिए धारा 498A भारतीय दंड सहिता एक महत्वपूर्ण क़ानून है, लेकिन इसके दुरूपयोग से पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता है |

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने कई विधि व्यवस्थाओं में स्थापित किया है कि क़ानून का मुख्य उद्देश्य संरक्षण है न कि किसी का उत्पीड़न | इसलिए महिलाओं की सुरक्षा आवश्यक है वही निर्दोष लोगों को भी क़ानून का संरक्षण मिलना चाहिए |

आखिरकार न्याय सिर्फ क़ानून से नहीं बल्कि उसके सही और संतुलित क्रियान्वयन से संभव होता है |

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ ): धारा 498A — Law vs Reality

प्रश्न 1 .धारा 498 A क्या है ?

उत्तर : भारतीय दंड संहिता (वर्तमान धारा 85 BNS ) के तहत यह एक आपराधिक प्रावधान है | यह प्रावधान पति या उसके परिजन तथा रिश्तेदारों द्वारा महिला के साथ क्रूरता (दहेज़ उत्पीड़न सहित ) को दण्डित करता है |

प्रश्न 2 .क्या धारा 498A का दुरुपयोग होता है ?

उत्तर : धारा 498A के दुरुपयोग के सम्बन्ध में शिकायते अक्सर मीडिया और न्याय निर्णयों के माध्यम से समाज के सामने आती रहती हैं | सुप्रीम कोर्ट की विधि व्यवस्था Sushil Kumar Sharma v. Union of India में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी धारा 498A के दुरुपयोग की संभावना को स्वीकार किया है |

प्रश्न 3 .क्या धारा 498A के सम्बन्ध में हर शिकायत पर तुरंत FIR दर्ज होती है ?

उत्तर : धारा 498A के तहत अपराध संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है इसलिए FIR दर्ज की जा सकती है, लेकिन Arnesh Kumar v. State of Bihar के अनुसार बिना जांच गिरफ्तारी नहीं की जा सकती है |

प्रश्न 4 .क्या धारा 498A के तहत पूरे परिवार को आरोपी बनाया जा सकता है ?

उत्तर : नहीं | इस अपराध में केवल उन लोगो को आरोपी बनाया जा सकता जिनके खिलाफ स्पष्ट और ठोस आरोप हों | माननीय सुप्रीम कोर्ट ने पूरे परिवार को आरोपी बनाने के लिए विधि व्यवस्था Preeti Gupta v. State of Jharkhand में चिंता जाहिर की है |

प्रश्न 5 . क्या 498A के अपराध में जमानत मिल सकती है ?

उत्तर : यद्धपि यह गैरजमानती अपराध है फिर भी अदालत परिस्थितयों के अनुसार जमानत दे सकती है |

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अस्वीकरण :

यह पेज केवल शैक्षणिक और जन-जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है | यह किसी विशेष व्यक्ति, संस्था या मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं है | 498A पर अधिक जानकारी के लिये योग्य अधिवक्ता से परामर्श आवश्यक है |

Note: Image credit: AI-generated illustration (created with ChatGPT)

 लेखक

Dr Raj Kumar
Founder- HumanRightsGuru / LawVsReality

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