भूमिका -उच्च शिक्षा सुधार की आवश्यकता क्यों ?
भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था लम्बे समय से जातिगत भेदभाव से गुजर रही है | इक्कीसवीं सदी में उच्च शिक्षा के केंद्, जिन्हें ज्ञान के केंद्र, के रूप में विकसित होना चाहिए, वे वंचित समुदायों के छात्रों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव, प्रशासनिक मनमानी का अखाड़ा बन रहे हैं |
साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि उच्च शिक्षा क्षेत्र में वंचित समूहों के छात्रों के मानव अधिकार कागजों पर तो सुरक्षित दिखाई देते हैं, लेकिन विश्वविद्यालयों से आने वाले आँकड़े कुछ और जमीनी हकीकत ब्यान करते हैं | रोहित बेमुला और पायल तड़वी इसके प्रासंगिक उदाहरण हैं |
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UGC Regulations 2012 – उद्देश्य और कानूनी ढांचा
UGC Regulations 2012 का मूल उद्देश्य
इस रेगुलेशन को मुख्य रूप से उच्च शिक्षा क्षेत्र में वंचित वर्गों के साथ होने वाले विभिन्न रूपों में होने वाले भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से लाया गया था |
इसमें वंचित समूहों के छात्रों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव के लिए शिकायत निवारण ढांचे का प्रावधान किया गया था | इसके अतिरिक्त इसका उद्देश्य छात्रों को मानसिक, सामाजिक और सेकसनिक सुरक्षा प्रदान करना था |
SC /ST छात्रों के लिए विशेष प्रावधान
इस रेगुलेशन के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि इसके द्वारा छात्रों के विरुद्ध होने वाले जातिगत उत्पीड़न या भेदभाव को अस्वीकार किया गया था तथा इस अमानवीय बुराई की रोकथाम के लिए उच्च शिक्षा संस्थाओं पर स्वैक्षिक दायित्व डाला गया था | जिसके परिणाम असफलता के रूप में सबके सामने हैं |
छात्र समस्या निराकरण ढांचा
UGC Regulations 2012 के द्वारा उच्च शिक्षा संस्थानों पर स्वैक्षिक जिमेदारी डाली गई थी कि वे अपने -अपने यहाँ स्वतंत्र शिकायत निवारण समिति की स्थापना करें |
जो छात्रों से शिकायत प्राप्त होने पर उनका समयबद्ध समाधान करें | स्वतंत्र शिकायत निवारण समिति पर यह भी दायित्व डाला गया था कि वह वंचित छात्रों की शैक्षिक संस्थान के अंदर अन्य छात्रों के प्रतिशोध से भी रक्षा करें |
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UGC Regulations 2012 की व्यवहारिक विफलताएं
कागजी प्रावधान बनाम जमीनी हकीकत
UGC Regulations 2012 के प्रावधान सलाहकारी प्रकृति के थे | उनमे विधिक बल का पूर्णतः अभाव था | विश्वविद्यालयों पर उनके पालन संबंधी कोई बाध्यता नहीं थी | साथ ही उन प्रावधानों का पालन न करने पर किसी भी प्रकार के दंड का कोई भी प्रावधान नहीं था |
अधिकाँश उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रशासनिक स्तर पर इनका पालन नहीं किया जा रहा था | अधिकाँश विद्यालयों या विश्वविद्यालयों में स्वतंत्र शिकायत समितियाँ निष्क्रिय अवस्था में पाई गई |
ऐसी स्थति में UGC Regulations 2012 की वंचित समूह के छात्रों के साथ भेदभाव रोकने में कोई उपयोगिता नहीं पाई गई है | ये क़ानून सिर्फ एक कागजी प्रावधान बन कर रह गया |
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विश्वविद्यालय प्रसाशन की मनमानी
अक्सर छात्रों की शिकायत के सम्बन्ध में विश्व विद्यालय प्रशासन द्वारा अनदेखी की गई या शिकायत ही नहीं दर्ज की गई | यदि कभी कभार दर्ज कर भी ली तो उन पर सुनवाई समय से नहीं हुई |
अगर सुनवाई हुई तो परिणाम अक्सर छात्रों के विरुद्ध रहे | इस रेगुलेशन के चलते छात्रों की सुनवाई कम, बल्कि उलटा छात्रों को उनके विरुद्ध कार्यवाही का सामना करना पड़ा है | यह सब प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के विपरीत है |
स्वंत्रत जांच और दाण्डिक प्रावधान का अभाव
UGC Regulations 2012 में स्वंत्रत जांच के प्रावधान का अभाव था तथा इसके अतिरिक्त वंचित वर्ग के छात्रों के साथ जातिगत,लैंगिक या दिव्यांगता आधारित भेदभाव किये जाने के स्थिति में किसी भी दाण्डिक प्रावधान की व्यवस्था इस रेगुलेशन में नहीं की गई थी |
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Rohit Vemula Case -UGC Regulations की सबसे बड़ी परिक्षा
मामले के तथ्य
Rohit Vemula एक होनहार छात्र था , जो हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में एक शोध छात्र के रूप में पढ़ाई कर रहा था | उसे असहमति और जातिगत भेदभाव के कारण विश्वविद्यालय के हॉस्टल से निष्काषित कर दिया था तथा उनकी छात्रबृति भी रोक दी गई थी |
जिसके कारण उन्हें आर्थिक, सामाजिक और आकादामिक बहिष्करण का सामना करना पड़ा था | परिणाम स्वरुप अन्ततः उसे आत्महत्या जैसे घातक कदम उठाने के लिए विवश होना पढ़ा था | जातिगत तथा संथागत भेदभाव का यह मुद्दा पूरे भारत के मीडिया की सुर्खिया बटोरता रहा |
UGC 2012 Regulations होने की बाबजूद सुरक्षा क्यों नहीं मिली ?
Rohit Vemula की जातिगत भेदभाव के परिणाम स्वरुप हुई अकाल मृत्यु के समय UGC 2012 Regulations अस्तित्व में था | लेकिन रोहित बेमुला को किसी प्रकार का संरक्षण नहीं मिला, क्यों कि शिकायत समिति स्वंत्रत और पारदर्शी नहीं थी |
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षण संस्थानों में समता का संवर्धन)नियमन, 2012 के नियम 3 के उपनियम (डी) में स्पष्ट रूप में लिखा गया है कि किसी छात्र की जाति के आधार पर छात्रबृति रोकना जातिगत भेदभाव की श्रेणी में आएगा | इस सम्बन्ध में नियम 3 में स्पष्ट प्रावधान किया गया है उच्च शिक्षा संस्था इसके लिए सुरक्षा उपाय करेगा |लेकिन जातिगत भेदभाव का स्तर इतना ऊंचा था की क़ानून का अनुपालन भी विश्वविद्यालय प्रसाशन ने मुनासिब नहीं समझा |
रोहित बेमुला के प्रकरण में विश्वविद्यालय ने उसकी फ़ेलोशिप रोक कर जातिगत भेदभाव को अंजाम दिया गया | यह विश्व विद्यालय के स्तर पर तभी संभव सका, जब UGC 2012 Regulations में कोई विधिक बल नहीं था अर्थात उसे स्वैक्षिक रूप में लागू करने के लिए कहा गया था |
इसके अतिरिक्त शिकायत निवारण में किसी भी बाहर की संस्था का हस्तक्षेप का प्रावधान नहीं था | इस स्थति में भी विश्व विद्यालय अनुदान आयोग की भी भूमिका अत्यधिक सीमित थी |
संवैधानिक दृष्टिकोण
रोहित बेमुला और पायल तड़वी के प्रकरण संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन का परिणाम था तथा संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार, जिसमे गरिमा के साथ जीने का अधिकार भी शामिल है, का भी उल्लंघन था | यह कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि रोहित बेमुला और पायल तड़वी के मामले संविधान के दोनों अनुच्छेदों के उल्लंघन के प्रतीक बन गए |
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UGC Regulations 2026 -से क्या बदला ?
UGC 2012 से UGC 2026 तक पहुंचने की प्रक्रिया में बहुत बड़ा बदलाव आया है | जहाँ एक तरफ UGC 2012 Regulations सलाहकारी मार्गदर्शक दिशानिर्देशों के रूप में लागू किये गए थे | वहीं UGC Regulations 2026 के प्रावधानों का अनुपालन न करने पर उच्च शिक्षा संस्थानों पर कार्यवाही किये जाने के आज्ञापक प्रावधान बनाये गए |
आज्ञापक प्रकृति का महत्व
UGC के नए प्रावधान आने के बाद स्पस्ट हो गया कि छात्रों द्वारा शिकायत किये जाने पर तय समय में कार्यवाही करनी पड़ेगी अर्थात संस्थागत जबाबदेही को प्रभावशाली बनाया गया है |
जबाब देही और पारदर्शिता
नए प्रावधानों के तहत छात्रों के साथ भेदभाव के मामले UGC को सूचना देना आवश्यक बनाया गया है | जातिगत भेदभाव रोकने के लिए सिर्फ क़ानून बना देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि क़ानून की सफलता उस क़ानून का ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ पालन किये जाने पर निर्भर करता है |
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निष्कर्ष
UGC 2012 Regulations को उच्च शिक्षा संस्थाओं में वंचित समुदायों के छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए लागू किया गया था | लेकिन UGC 2012 Regulations का पालन करना या न करना उच्च शिक्षण संस्थाओं पर छोड़ दिया गया था |
रेगुलेशन में कोई कमी नहीं थी सिर्फ संथागत इच्छा शक्ति की आवश्यकता थी उसके पालन के लिए | यही दुर्भाग्य था कि सम्पूर्ण भारत में किसी भी संस्थान ने उसके पालन के लिए किसी भी रूप में इच्छा शक्ति का प्रदर्शन नहीं किया |
परिणाम स्वरुप उच्च शिक्षा संस्थानों में ऐच्छिक UGC 2012 Regulations पूरी तरह जातिगत भेदभाव को समाप्त या कम करने में पूरी तरह असफल रहा |
UGC 2012 Regulations के अस्तित्व में रहते हुए भी उसके उलंघन में रोहित बेमुला और पायल तड़वी जैसी सम्पूर्ण देश को झकझोर देने वालीं घटनाएं हुईं | लेकिन UGC 2026 Regulations में UGC 2012 Regulations के प्रावधानों में सुधार करते हुए उसे लागू किये जाने लायक क़ानून का रूप दिया गया है |
नए रेगुलेशंस में संस्थागत जिम्मेदारी को सुदृढ़ करते हुए दाण्डिक प्रावधानों की भी व्यवस्था की गई है | इन दाण्डिक प्रावधानों से छात्रों पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ने वाला है | ये प्रावधान सिर्फ उच्च शिक्षा संस्थाओं पर लागू होंगे ,वह भी तब ,जब विश्व विद्यालय अनुदान आयोग की जांच समिति द्वारा यह सिद्ध कर दिया जाता है कि उच्च शिक्षा संस्थान द्वारा UGC 2026 Regulations के प्रावधानों का पालन नहीं किया गया है |
इस अनुक्रम में उच्च शिक्षा संस्थान पर कार्यवाही करते हुए पहला उसे UGC योजना में भाग लेने से वंचित किया जाएगा | दूसरा उसे उपाधि /डिग्री कार्यक्रम चलाने से वंचित किया जाएगा | तीसरा उसे मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षा और ऑनलाइन माद्यम से कार्यक्रम संचालित करने से वंचित किया जाएगा | चौथा उसे UGC अधिनियम 1956 की धारा 2 (च ) और 12बी के तहत रखी गई उच्च शिक्षा संस्थाओं की सूची से हटा दिया जाएगा |
अर्थात उच्च शिक्षा संस्थान के विरुद्ध इनमे से एक या अधिक कार्यवाही की जाएगी | उपरोक्त के अवलोकन से स्पष्ट है कि यह क़ानून संस्थाओं को आज्ञापक क़ानून का पालन करने के लिए कहता है कि उच्च शिक्षा संस्थान में किसी भी आधार पर होने वाले भेदभाव को रोके | अर्थात यह भेदभाव करने वाले छात्रों के विरुद्ध किसी भी तरह का प्रत्यक्ष रूप में दाण्डिक प्रावधान नहीं करता है|
सामान्य वर्ग के छात्रों और अभिभावकों को इससे किसी भी प्रकार से भयाक्रांत होने की आवश्यकता नहीं है, जब तक भेदभाव करने वाले छात्र भारतीय न्याय संहिता (BNS) में दिए गए अपराध को नहीं करते हैं या अन्य तत्समय प्रबृत क़ानून के तहत अपराध नहीं करते हैं |
यह कहना पूर्ण रूप से मिथ्या है कि नए क़ानून के तहत सामान्य वर्ग के छात्रों या अध्यापकों को किसी प्रकार की जेल की सजा जैसे किसी दाण्डिक प्रावधान का सामना करना पडेगा |
यह कानून उच्च शिक्षा क्षेत्र में वंचित समुदाय के छात्रों के विरुद्ध होने वाले जातिगत या अन्य आधारों पर होने वाले भेद-भाव को रोकने के लिए सामाजिक प्रकृति का क़ानून है न कि भेदभाव करने वालों के विरुद्ध जेल जैसे दाण्डिक कार्यवाही करने के लिए क़ानून |
अस्वीकरण :
यह लेख केवल शैक्षणिक और जन-जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है | यह किसी विशेष व्यक्ति, संस्था या मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं है | अधिक जानकारी के लिये योग्य अधिवक्ता से परामर्श आवश्यक है |
Note: Image credit: AI-generated illustration (created with ChatGPT)
✍️ लेखक
Dr Raj Kumar
Founder, HumanRightsGuru / LawVsReality
2 thoughts on “UGC Regulations 2012 से 2026 तक: जवाबदेही, पारदर्शिता और छात्र अधिकारों की नई नियामक रूपरेखा”